<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Joy Vastu</title>
	<atom:link href="https://www.joyvastu.com/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://www.joyvastu.com</link>
	<description>Get Latest Vaastu Tips for Home, Commercial and Industrial</description>
	<lastBuildDate>Sun, 05 Apr 2026 13:13:18 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/01/joyvastu_favicon.png</url>
	<title>Joy Vastu</title>
	<link>https://www.joyvastu.com</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>भूमि-विस्तार के वास्तु प्रभाव</title>
		<link>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%bf-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%aa%e0%a5%8d/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deepak]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Feb 2018 07:18:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी खण्ड]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.joyvastu.com/?p=660</guid>

					<description><![CDATA[यह जानकर आश्चर्य होगा कि भूमि अथवा भवन में किसी दिशा में हुए विस्तार का भी आश्चर्यजनक प्रभाव होता है I यह विस्तार भूखंड में हो अथवा भवन में, निश्चित रूप से इसका प्रभाव देखने को मिलता है I विस्तार के इस प्रभाव को समझने में वास्तु-शास्त्र के अलावे ज्योतिषीय ज्ञान भी बहुत सहायक सिद्ध [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><img decoding="async" class="alignleft wp-image-661 size-thumbnail" src="http://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/02/वास्तु-इमेज-पूर्ण-1-200x150.jpg" alt="" width="200" height="150" /></p>
<p>यह जानकर आश्चर्य होगा कि भूमि अथवा भवन में किसी दिशा में हुए विस्तार का भी आश्चर्यजनक प्रभाव होता है I यह विस्तार भूखंड में हो अथवा भवन में, निश्चित रूप से इसका प्रभाव देखने को मिलता है I विस्तार के इस प्रभाव को समझने में वास्तु-शास्त्र के अलावे ज्योतिषीय ज्ञान भी बहुत सहायक सिद्ध होता है I तो चलें इस प्रभाव को वास्तु-शास्त्र, ज्योतिष और ऊर्जा परिभ्रमण के मिले जुले प्रभावों के रूप में समझने का प्रयास करें I</p>
<p>जिस प्रकार से वास्तु-शास्त्र के अनुसार घर की प्रत्येक दिशा एवं उपदिशा किसी न किसी ग्रह की प्रधानता को दर्शाती है उसी प्रकार से किसी घर का ज्योतिषीय आकलन भी उसकी दिशाओं के आधार पर किया जा सकता है I इन दोनों बातों को समझने के लिए हमें सबसे पहले वास्तु में ग्रहों के स्थान, उनके नैसर्गिक प्रभावों के साथ-साथ कुण्डली के सभी भावों का वास्तु-विश्लेषण और उनके प्रभावों को भी समझना आवश्यक हो जाता है I</p>
<p>वास्तुशास्त्र के मूल में पंचतत्व जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और आकाश तत्वों से प्राप्त होने वाली ऊर्जाओं और उनके प्रभावों के सूक्ष्म अध्ययन से सम्बंधित है I इसमें दिशाओं और उपदिशाओं को पांच तत्वों और उनके पारस्परिक संबंधों के आधार पर बताया गया है I ये दिशाएँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण हैं, जबकि उपदिशायें उत्तर-पूर्व (ईशान), उत्तर-पश्चिम(वायव्य), दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), दक्षिण- पूर्व   (आग्नेय) और केंद्र (ब्रह्मस्थान) हैं I इनमें जल तत्व का स्थान उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण, अग्नि तत्त्व का स्थान दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्न्येय कोण, पृथ्वी तत्व का स्थान दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण, वायु का स्थान उत्तर-पश्चिम कोण अर्थात् वायव्य कोण और आकाश-तत्व का स्थान मध्य में अर्थात् ब्रह्मस्थान में निर्धारित किया गया है I इन तत्वों के पारस्परिक सम्बन्धों से उत्पन्न प्रभावों और उनके निदान के लिए आज के आधुनिक युग में भी वास्तुशास्त्र बहुत उपयोगी है I इसी प्रकार से ज्योतिष शास्त्र में वर्णित नवग्रहों का स्थान भी वास्तुशास्त्र में सभी दिशाओं और उपदिशाओं पर निर्धारित किया गया है I ईशान कोण में देवगुरु बृहस्पति, पूर्व में सूर्य,आग्नेय में शुक्र, दक्षिण में मंगल, नैऋत्य में राहू, पश्चिम में शनि, वायव्य में चन्द्रमा,और उत्तर में बुध का स्थान नियत किया गया है I ज्योतिषशास्त्र में केतु को मोक्षकारक ग्रह मानने के कारण ईशान कोण में देवगुरु बृहस्पति के साथ इसका भी स्थान नियत किया गया है I</p>
<p>विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं की गति और दिशा के सम्बन्ध में भी वास्तुशास्त्र में वर्णन किया गया है, जिसमे पृथ्वी की घूर्णन गति, परिक्रमा, भू-चुम्बकीय प्रभाव आदि के आधार पर घर में इन ऊर्जाओं का प्रवाह अंग्रेजी अक्षर <strong>s</strong> के  आकार में दर्शाया गया है और इनसे मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर उनको वर्गीकृत भी किया गया है I इन ऊर्जाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऊर्जाएं पूर्व दिशा से आने वाली प्राणिक ऊर्जा है जिसका पश्चिम दिशा में क्षय हो जाता है और उत्तर दिशा से आने वाली जैविक ऊर्जा है जिसका दक्षिण दिशा में क्षय हो जाता है I ये सभी ऊर्जाएं सम्मिलित रूप से एक प्रवाह की तरह उत्तर-पूर्व से प्रवेश करती है, उसके बाद उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर जाती हुई अंत में दक्षिण-पश्चिम कोने से बाहर निकल जाती है। इसीलिए दक्षिण-पश्चिम दिशा मूल रूप से जैविक ऊर्जा और प्राणिक ऊर्जा की क्षरण दिशा अर्थात् समाप्ति की दिशा है I एक अन्य महत्वपूर्ण विन्दु यह है कि ऊर्जा का प्रवेश जमीन के  सबसे निचले स्तर से होते हुए उत्तरोत्तर उर्ध्वगति से अंग्रेजी के एस अक्षर की तरह दक्षिणी-पश्चिमी दिशा तक होता है I  इसी कारण से वास्तु-शास्त्र में उत्तर-पूर्व की दीवार की ऊंचाई को सबसे कम और दक्षिण-पश्चिम की दीवार को सबसे ऊंची रखने के सलाह दी जाती है। यह केवल घर में उन लाभकारी ऊर्जाओं को स्थिरतापूर्वक बनाए रखने के उद्देश्य के लिए किया जाता है ।</p>
<p>हमने प्रायः देखा है कि मजबूत आर्थिक स्थिति और भूखण्ड की सहज उपलब्धता के कारण लोग अपने भवन या भूमि के बगल की जमीन को खरीदने के लिए तत्पर रहते हैं I परन्तु घर या भूखंड में होने वाले ऐसे किसी भी विस्तार का प्रभाव निश्चित रूप से सम्बंधित दिशा और उसके प्रतिनिधि ग्रह के प्रभाव की वृद्धि के कारण अच्छा या बुरा होता है अथवा उस दिशा से सम्बंधित तत्व के प्रभाव में वृद्धि के रूप में अनुभव किया जा सकता है I इसके प्रभावों के विश्लेषण के लिए व्यक्ति की कुण्डली के विभिन्न भावों और उनके प्रभावों को भी समझना आवश्यक है I जहाँ एक ओर कुंडली का प्रथम भाव घर की पूर्व दिशा को दर्शाता है वहीँ चतुर्थ भाव घर की उत्तर दिशा को दर्शाता है, सप्तम भाव पश्चिम दिशा को और दशम भाव दक्षिण दिशा को दर्शाता है I इस चार्ट को समझने से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि घर के उत्तर-पूर्व अर्थात् ईशान कोण की दिशा कुण्डली के दूसरे और तीसरे भाव को, पंचम और छठा भाव उत्तर-पश्चिम अर्थात् वायव्य कोण की दिशा को, अष्टम और नवम भाव दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण को और एकादश और बारहवां भाव घर की दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्न्येय कोण की दिशा की स्थिति बताता है I कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों की स्थिति के आधार पर व्यक्ति के घर की विभिन्न दिशाओं और कोणों के बारे में स्पष्ट जानकारी मिल सकती है I</p>
<p>इस तरह हम ऊर्जा के भ्रमण मार्ग, ग्रहों के अधिक या न्यून प्रभाव और कुंडली के सभी भावों पर पड़ने वाले असर के अनुसार घर की दिशाओं और कोणों के विस्तार के प्रभावों को भी आसानी से समझ सकते हैं अर्थात् किसी दिशा अथवा कोण में हुए परिवर्तन से हम उस व्यक्ति और उसके जीवन के विभिन्न आयामों पर होने वाले असर का विश्लेषण कर सकते हैं I भूमि या भवन की किसी दिशा के विस्तार का शुभ या अशुभ प्रभाव घर में रहने वालों को ही प्राप्त होता है चाहे वह अपने भवन में रहे अथवा किराए के मकान में रहे I इसीलिए यदि किराए के मकान में भी रहना पड़े तो सोच-समझ कर ही निवासस्थान चुनना चाहिए I एक और बात जो शुरू में ही बता देना उचित होगा कि यदि किन्ही कारणों से अनजाने में नीचे बताए गए अनिष्टकारी दिशाओं अथवा कोणों में वृद्धि हो गयी हो और उसके दुष्परिणाम दिखने लगे हों तो अविलम्ब उसका वास्तु उपचार करवा लेना चाहिए जिससे और अधिक हानि या नुकसान से बचा जा सके नहीं तो यह एक स्थायी दुष्परिणाम के रूप में परिणत हो जाएगा और जीवन भर एक पीड़ादायक शूल की तरह चुभता रहेगा I अतः अब हम भूमि और भवन की प्रत्येक दिशा और कोणों के विस्तार को क्रम से समझने का प्रयास करते हैं I</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignleft wp-image-139 size-thumbnail" src="http://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/01/direction-200x150.jpg" alt="" width="200" height="150" />पूर्व दिशा में विस्तार </strong></p>
<p>पूर्व दिशा के विस्तार अर्थात् कुंडली के प्रथम भाव, दूसरे भाव और बारहवें भावों से सम्बंधित प्रतिनिधि ग्रहों सूर्य, देवगुरु बृहस्पति और शुक्र के गुणों में एक साथ वृद्धि से व्यक्ति के व्यक्तित्व, यश-प्रसिद्धि और व्यय में असाधारण विस्तार परिलक्षित होता है I कुंडली का प्रथम भाव व्यक्ति के मुखमंडल, व्यक्तित्व, शारीरिक बनावट और स्वास्थ्य की स्थिति बताता है जबकि धन भाव से व्यक्ति के संपत्ति और बारहवें भाव से उसके व्यय का पता चलता है I हालांकि बारहवां भाव व्यय भाव होने के कारण प्रायः अच्छा नहीं माना जाता परन्तु बृहस्पति के प्रभाव से ऐसा व्यय भी अच्छे प्रयोजनों से होने के कारण यश में वृद्धि ही करता है I  इसीलिए पूर्व दिशा के विस्तार से व्यक्ति के व्यक्तित्व में सूर्य के समान प्रखरता के साथ गृहोपयोगी वस्तुओं में वृद्धि होती है और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से मुक्ति मिलती है I इस तरह से हम कह सकते हैं कि पूर्व का विस्तार <strong>एक शुभ विस्तार</strong> है I अतः यदि घर की पूर्व दिशा में खाली जमीन हो तो उसे ऊंचे भाव पर भी खरीद लेना चाहिए क्योंकि ऐसी खाली जमीन भाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है I</p>
<p><strong>पूर्वोत्तर (ईशान कोण) का विस्तार </strong></p>
<p>ईशान कोण के विस्तार का मतलब कुंडली के दूसरे और तीसरे भाव के प्रभाव में वृद्धि, जिसका सीधा मतलब हुआ कि व्यक्ति के धन भाव और पराक्रम भाव में धनात्मक बदलाव I यदि पूर्वी ईशान में विस्तार होता है तो व्यक्ति को लक्ष्मी की प्राप्ति होगी और यदि उत्तरी ईशान में वृद्धि हो तो उसके ज्ञान और पराक्रम में वृद्धि होगी I इस कोण के स्वामी देवगुरु बृहस्पति और मोक्षकारक छायाग्रह केतु के शुभ प्रभावों से व्यक्ति में ज्ञानोदय होगा और सांसारिक लोभों से विरक्ति के साथ-साथ ईश्वर में आस्था बढ़ेगी I ऐसे व्यक्ति के घर में सदैव दैवी कृपा बनी रहती है I इसलिए उत्तर-पूर्व अर्थात् ईशान कोण में किया गया विस्तार <strong>एक अति शुभ विस्तार</strong> है जो वृद्धि व्यक्ति के लिए सर्वमंगलकारी और शुभ मानी जायेगी I अतः यदि घर की उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात् ईशान कोण में खाली जमीन हो तो उसे निश्चित रूप से ऊंचे भाव पर भी खरीद लेना चाहिए क्योंकि ऐसी खाली जमीन महाभाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है I</p>
<p><strong>उत्तर का विस्तार </strong></p>
<p>उत्तर दिशा व्यक्ति की कुंडली के चतुर्थ भाव का प्रतिनिधित्व करती है और बुध ग्रह का स्थान है I इस कारण से इस दिशा में हुई वृद्धि से उत्तर-पूर्व (ईशान), उत्तर और उत्तर-पश्चिम (वायव्य) दिशाओं का एक साथ विस्तार होने का प्रभाव बृहस्पति, बुध और चन्द्रमा के प्रभावों में विस्तार के रूप में अर्थात् यश, बुद्धि और आय में वृद्धि और संगत फलों की प्राप्ति के रूप में दिखता है I चतुर्थ भाव गृह्सुख, भूमि, भवन और माता के सुख से सम्बंधित प्रभावों का कारक होता है I अतः भूमि अथवा भवन के उत्तर दिशा में हुई वृद्धि से व्यक्ति की मेधा में विस्तार के साथ घर मे यश प्रतिष्ठा के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने हेतु आवश्यक साधनों में भी वृद्धि का योग बनता है अर्थात् घर में भोग-विलासिता की वस्तुओं में बढ़ोत्तरी होती है I इसीलिए घर अथवा भूमि की उत्तर दिशा में हुआ विस्तार भी <strong>शुभ विस्तार</strong> होता है और सुखकारक  होता है I अतः यदि घर की उत्तर दिशा में खाली जमीन हो तो उसे ऊंचे भाव पर भी खरीद लेना चाहिए क्योंकि ऐसी खाली जमीन भाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है I</p>
<p><strong>उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) का विस्तार</strong></p>
<p>उत्तर-पश्चिम अर्थात् वायव्य कोण में चन्द्रमा का स्थान होने के कारण और कुण्डली के पञ्चम और षष्ठम भाव के कारक होने के फलस्वरूप उसके अनुसार ही फलों की प्राप्ति होती है अर्थात् वायव्य का विस्तार कुंडली के पंचम भाव के फलों जैसे संतान, शिक्षा और रोमान्स के साथ-साथ छठे भाव यानी रोग, ऋण और शत्रुता में भी वृद्धि का कारक है I इसके कारण यह विस्तार <strong>शुभ और अशुभ</strong> दोनों ही प्रभावों का कारक है I चन्द्रमा मन का प्रतिनिधित्व करता है है जिसके कारण मन की चंचलता में काफी बढ़ोत्तरी होती है और आसपास के लोगों और मित्रों-शुभचिंतकों से अकारण बैर और मनमुटाव होने की संभावना बढ़ जाती है I इसीलिए इस दिशा में बहुत सोच समझ कर और पूरे उपायों के साथ भूमि अथवा भवन में विस्तार करना उचित होगा I</p>
<p><strong>पश्चिम दिशा का विस्तार</strong></p>
<p>इस दिशा के प्रतिनिधि ग्रह शनि के होने और कुंडली के सप्तम भाव का कारक होने के कारण इस दिशा में होने वाले विस्तार के कारण उत्तर-पश्चिम, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशाओं का एक साथ विस्तार होता है, जो छठे, सातवें और आठवें भावों से सम्बंधित प्रभावों में बढ़ोत्तरी के रूप में देखा जा सकता है I जहाँ एक ओर छठा भाव ऋण, रोग और शत्रुता का कारक है वहीँ अष्टम भाव मृत्यु, वसीयत और बीमा राशि की प्राप्ति का भी कारक है I पश्चिम दिशा प्राणिक ऊर्जा के क्षय की भी दिशा है इसीलिए जीवन में वसीयत या बीमा राशि पाने का मतलब बड़ा ही अशुभ होता है और घर के मुखिया अर्थात गृहस्वामी की मृत्यु को इंगित करता है I इन दिशाओं के प्रतिनिधि ग्रहों जैसे चन्द्रमा, शनि और राहु के सम्मिलित प्रभाव से प्रत्येक कार्यों में विलम्ब के साथ-साथ अपयश और शत्रुता अर्थात् सभी प्रकार से अमंगल और अशुभ लक्षण देखने को मिलते हैं I यहाँ तक कि पश्चिम के विस्तार का फल दीर्घकालिक पारिवारिक अधोगति के रूप में भी देखने को मिलता है जिससे उबरने में भी काफी समय लगता है I इसीलिए इस दिशा में भूमि या भवन का विस्तार अत्यंत ही अशुभ परिणाम देने वाला होता है I यदि इस दिशा में कोई खाली जमीन बिक्री के लिए उपलब्ध भी हो तो इसे आधी कीमत पर और यहाँ तक कि मुफ्त में लेना भी अहितकर है I ऐसा <strong>अशुभ विस्तार</strong> सीधे तौर पर अपने और अपने परिवार के लिए दुर्भाग्य को आमंत्रित करने जैसा है I</p>
<p><strong>दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) का विस्तार</strong></p>
<p>नैऋत्य कोण अर्थात् दक्षिण-पश्चिम दिशा का सम्बन्ध कुण्डली के अष्टम और नवम भावों से है, जिसका प्रतिनिधित्व राहु करता है I ऐसा विस्तार भूमि और भवन के लिए सर्वथा अनिष्टकारी है क्योंकि यह दिशा घर में राहु के प्रभाव की वृद्धि करता है I अष्टम भाव मृत्यु, वसीयत और बीमा राशि की प्राप्ति का कारक है जबकि नवम भाव भाग्य और पिता का कारक है I यह दिशा जैविक ऊर्जा और प्राणिक ऊर्जा के विलोप की भी दिशा है जिसके कारण उस घर में रहने वाले सदस्यों की समग्र ऊर्जाओं के क्षय की प्रबलता हो जाती है I इस दिशा का विस्तार उस घर में रहने वालों के मान-सम्मान, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि, आदि को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है, जिसके कारण कोर्ट-कचहरी, हॉस्पिटल, जेल आदि का भी सामना करना पड़ सकता है I इस दिशा में होने वाले विस्तार का असर उस घर में होने वाली सभी अशुभ घटनाओं में भी देखा गया है I यदि इस कोण में पश्चिम दिशा में विस्तार होता है तो ऐसा विस्तार गृहस्वामी के लिए प्राणघातक होता है और यदि ऐसा विस्तार दक्षिण दिशा की ओर होता है तो यह गृहस्वामिनी के लिए घातक होता है I इसीलिए इस दिशा में भूमि या भवन का विस्तार अत्यंत ही अशुभ परिणाम देने वाला होता है I यदि इस दिशा में कोई खाली जमीन बिक्री के लिए हो भी तो इसे किसी भी हालत में कम कीमत पर और यहाँ तक कि मुफ्त में लेना भी सब प्रकार से विनाशकारी होता है I ऐसा<strong> अशुभ विस्तार</strong> अपने और अपने परिवार के लिए सभी तरह के दुर्भाग्य को आमंत्रित करने के समान है I</p>
<p><strong>दक्षिण का विस्तार </strong></p>
<p>दक्षिण दिशा के विस्तार से भूमि के दक्षिण-पश्चिम, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व का एक साथ  विस्तार होता है I इस दिशा के प्रतिनिधि ग्रह राहु, मंगल और शुक्र हैं और जो व्यक्ति की कुण्डली के अष्टम, नवम और दशम भावों को दर्शाता है I दक्षिण दिशा घर की जैविक ऊर्जा के क्षय की दिशा भी है I वास्तु-शास्त्र के अनुसार यह दिशा घर की महिला सदस्यों की दिशा है और इसी कारण से इसका प्रतिकूल प्रभाव राहु, मंगल और शुक्र की युति के कारण महिलाओं के लिए अहितकर है I साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए भी इस दिशा में विस्तार अत्यंत हानिकारक पाया गया है I यदि दक्षिण दिशा में कोई खाली जमीन बिक्री के लिए हो भी तो इसे किसी भी हालत में कम कीमत पर और यहाँ तक कि मुफ्त में लेना भी सब प्रकार से हानिकारक होता है I ऐसा <strong>अशुभ विस्तार</strong> सीधे तौर पर घर की महिला सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए सभी तरह से अमंगलकारी और दुर्भाग्य को आमंत्रित करने के समान है I</p>
<p><strong>दक्षिण-पूर्व (आग्न्येय कोण) का विस्तार</strong></p>
<p>दक्षिण-पूर्व अर्थात् आग्न्येय कोण के विस्तार का विचार कुण्डली के ग्यारहवें, बारहवें और प्रथम भावों से किया जाता है जो मंगल, शुक्र और सूर्य के बढे प्रभावों को इन्गित करता है I मंगल और सूर्य के बढ़े प्रभाव से अंगारक योग बनता है जो व्यक्ति को उग्र बनाता है और उसमे शुक्र की प्रभावी युति से राजपक्ष से परेशानियां आती हैं, अर्थात् दक्षिण-पूर्व के विस्तार से कोर्ट-कचहरी से सम्बंधित परेशानियां बढती हैं I शुक्र और राहु की अनिष्टकर युति से घर की महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है साथ ही व्यक्ति विभिन्न व्यसनों का आदी हो जाता है I यदि दक्षिण-पूर्व दिशा में कोई खाली जमीन बिक्री के लिए हो भी तो इसे लेना हानिकारक होता है I ऐसा विस्तार सीधे तौर पर घर की महिला सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए अहितकर और परिवार के पुरुष सदस्यों के व्यसनी होने की संभावना को बढाता है साथ ही साथ राजपक्ष से चिंता-परेशानियां भी देता है I यदि कुण्डली में अन्य ग्रहों के भी अशुभ योग बन रहे हों तो व्यक्ति को कारावास का दंड भी भोगना पड़ सकता है I इसीलिए सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार की महिला सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस <strong>अमंगलकारी विस्तार</strong> से बचना चाहिए I</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वास्तु के सरल उपाय</title>
		<link>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%b2-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%af/</link>
					<comments>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%b2-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%af/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deepak]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Feb 2018 20:19:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Vaastu Tips in Hindi]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.joyvastu.com/?p=626</guid>

					<description><![CDATA[दूसरों के लिए शुभ की कामना ही हमारे अन्दर के देवत्व की अभिव्यक्ति है I परन्तु मानवोचित गुणों के कारण हमारी स्वयं के लिए भी यही स्वाभाविक इच्छा होती है और इसी की प्राप्ति के लिए हम निरंतर प्रयास भी करते रहते हैं I प्रतिदिन के कार्यों में ऐसे कई कार्य हैं जिनको करके हम [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>दूसरों के लिए शुभ की कामना ही हमारे अन्दर के देवत्व की अभिव्यक्ति है I परन्तु मानवोचित गुणों के कारण हमारी स्वयं के लिए भी यही स्वाभाविक इच्छा होती है और इसी की प्राप्ति के लिए हम निरंतर प्रयास भी करते रहते हैं I प्रतिदिन के कार्यों में ऐसे कई कार्य हैं जिनको करके हम अपने लिए और अपने करीबी लोगों के लिए कुछ अच्छा कर सकते हैं I अनजाने में हम कई ऎसी गलतियाँ कर देते हैं या कुछ चीजों की अनदेखी कर देते हैं जो वैसे तो काफी छोटी सी होती हैं परन्तु उनका प्रभाव काफी गंभीर होता है और न चाहते हुए और न जानते हुए भी हम जिन्हें भोगते रहते हैं I इसीलिए कुछ ऐसे ही छोटे-छोटे वास्तु-सम्मत उपायों को यहाँ बताया गया है जिनको करने से हम उन अनजाने और अनचाहे कष्टों से बच सकते हैं और घर में सुख , शान्ति और समृद्धि ला सकते हैं I</p>
<p>घर से बाहर निकलते समय या घर के अन्दर आने के समय हमें अपना दाहिना पैर पहले आगे बढ़ाना चाहिए क्योंकि शास्त्रों के अनुसार हमारे शरीर का दायाँ भाग शुभ कर्मों के लिए उपयुक्त माना गया है I शुरू मे कठिनाई हो सकती है परन्तु धीरे-धीरे इसकी आदत हो जायेगी I वस्तुतः हम कहीं भी अपने आभामंडल के सूक्ष्म शरीर के साथ चलते हैं जो हमारे अच्छे या बुरे भावों के अनुसार कमजोर या मजबूत होता है I क्रोध, लोभ, घृणा, ईर्ष्या आदि ऋणात्मक भावनाएं हमारे आभामंडल को कमजोर करती हैं जबकि प्रेम, क्षमाशीलता, सहिष्णुता, करुणा आदि शुभ भावनाएं हैं जो हमारे आभामंडल को मजबूती प्रदान करती हैं I एक मजबूत आभामंडल का व्यक्ति हमारे आसपास के वातावरण पर बहुत सकारात्मक असर डालता है I उसकी उपस्थिति मात्र से ही सुखद अनुभूति प्राप्त होती है जबकि कमजोर आभामंडल वाले व्यक्ति की उपस्थिति मन को खिन्न और बोझिल बना देती है I इसीलिए हमेशा प्रयास करना चाहिए कि अपने या किसी के घर से निकलने  या अन्दर आने के समय शुभत्व की भावना के साथ दाहिना पैर ही  आगे बढ़ाना चाहिए I</p>
<p>घर में प्रायः लोग स्वास्तिक, ॐ, नवग्रह पिरामिड अथवा ऐसे ही अन्य शुभ प्रतीक चिन्हों को हर जगह लगा देते हैं, यहाँ तक कि टॉयलेट और किचेन के दरवाजे पर भी लोग इसका उपयोग वास्तु सुधार के लिये करते हैं I ऐसा करना उचित नहीं है I इनका प्रयोग किसी अस्वच्छ स्थानों पर करने से इसका बुरा असर भी देखने को मिलता है I इन प्रतीक चिन्हों को अत्यधिक बायो कॉस्मिक ऊर्जा से धनी होने के कारण  प्रतीकात्मक वास्तु-शास्त्र मे भी  देवगुरु बृहस्पति का प्रतीक माना गया है जिनका स्थान घर के उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण में ही है I यहाँ तक कि देवी-देवताओं के चित्रों वाले वार्षिक कैलेंडर भी घर में हर जगह पर नही लगाने चाहिए क्योंकि इसका भी वैसा ही प्रभाव होता है जैसा किसी दिशा या उपदिशा के प्रतिनिधि ग्रह के साथ बृहस्पति की युति का होता है I</p>
<p>घर की दीवारों पर हम कलेंडर, पोस्टर या पिक्चर लगाने के लिए या विशेष अवसर पर जगह जगह कील कांटी लगा देते हैं जो बाद में भी नहीं हटाते हैं I हमारा घर ईंट, सीमेंट, छड़ों आदि से निर्मित कंक्रीट का सिर्फ ढांचा ही नहीं है बल्कि वैदिक मान्यताओं के अनुसार जीवंत ऊर्जापुन्ज है जिसे हमारे वैदिक ग्रंथों में वास्तु-पुरुष के रूप में चित्रित किया गया है I इसीलिए जिस प्रकार शरीर में कहीं कील चुभ जाने से हमें दर्द का अहसास होता है ठीक उसी प्रकार से घर की दीवारों में अनावश्यक कील-कांटी होने से वास्तु-पुरुष भी पीड़ित होते हैं परन्तु अंतर इतना ही है कि उनकी पीड़ा का असर उस घर में निवास करने वालों को ही रोग, शोक अथवा अन्य समस्यायों के रूप में भोगना पड़ता है I</p>
<p>कई घरों में लोग शुरूआती शौक के कारण ढेर सारे बल्ब-टयूबलाइट्स के लिए स्थान बना लेते हैं पर बाद में किन्ही कारणों से उन सभी होल्डर्स में बल्ब या टयूबलाइट्स नहीं लगाते हैं या कभी कभी तो किसी खराब बल्ब के स्थान पर घर के ही किसी अच्छे बल्ब को निकाल कर लगा देते हैं I ऐसा करके वास्तव में वो एक स्थान के वास्तु-दोष को दूर करने के क्रम में अपने ही घर के किसी और स्थान में एक नया वास्तु-दोष उत्पन्न कर देते हैं जिसका दुष्प्रभाव आखिरकार उन्हें ही भोगना पड़ता है I खाली और खुले इलेक्ट्रिक होल्डर्स से निकलने वाली सूक्ष्म विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों के कारण उसका सूक्ष्म असर एलेक्ट्रोस्मॉग के निर्माण के रूप में मिलता है जिसके कारण घर के अन्दर स्वाभाविक ऊर्जा प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न होता है I इस एलेक्ट्रोस्मॉग के कारण उस स्थान में पॉजिटिव आयन की बहुलता हो जाती है जो वहां रहने वालों के मस्तिष्क के अल्फा क्षेत्र को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है I यह अल्फा क्षेत्र व्यक्ति के उन मनोभावों का कारक है जिनसे व्यक्ति खुशी और शान्ति का अनुभव करता है, परन्तु एलेक्ट्रोस्मॉग के कारण व्यक्ति असहजता, चिडचिडापन, घबड़ाहट, नींद की कमी आदि मह्सूस करता है जो आगे चलकर उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में ह्रास का कारण बनता है I</p>
<p>इनके अलावे कुछ और भी छोटे-छोटे उपाय हैं जिनका ख़याल रखने से घर में सुख, शांति और उल्लास का वातावरण बना रहेगा जैसे</p>
<ul>
<li>भूमि और भवन के बीच में चारों ओर खुला स्थान होना चाहिए और घटते क्रम से सबसे ज्यादा खुली जगह पूर्व दिशा में, उसके बाद उत्तर दिशा में और इससे कम दक्षिण दिशा में और सबसे कम पश्चिम दिशा में खाली और खुली जगह होनी चाहिए I</li>
<li>जमीन, घर और छत की ढाल दक्षिण-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व, उसके बाद उत्तर-पश्चिम और सबसे नीचे उत्तर-पूर्व की तरफ होना चाहिए I</li>
<li>दर्पण और घडी को कभी भी दक्षिण या पश्चिम की दीवार पर नहीं लगाना चाहिए I</li>
<li>घर की दीवारों की हमेशा देखभाल करनी चाहिए ताकि कोई दरार, पपड़ी या काई न हो पाए, ऐसा होने पर अविलम्ब इसकी मरम्मत करवानी चाहिए नहीं तो घर के सदस्यों को स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो सकती है I चौखट और दीवार के बीच की दरार की भी मरम्मत करवानी चाहिए I</li>
<li>पानी के नल से लगातार रिसता पानी घर के खर्च को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देता है I</li>
<li>किवाड़ों के खुलने और बंद होने के समय होने वाली होने वाली आवाजें गृहकलह और अज्ञात भय का कारण होती हैं, अतः इनके कब्जों में हमेशा तेल डालके दुरुस्त रखना चाहिए I</li>
<li>शयन कक्ष में कभी भी हिंसा, क्रोध, शोक, घृणा उत्पन्न करने वाली फोटो, पेंटिंग या पोस्टर्स नहीं लगाने चाहिए नहीं तो उसी के अनुरूप परिस्थितियां बनने लगती हैं I यह स्थान नुकीली वस्तुओं जैसे तलवार, कटार, कैंची, छुरी को भी खुले में रखने के लिए नहीं है I</li>
<li>घर के अन्दर की दीवारों के रंग हलके और खुशनुमा होने चाहिए, गहरे रंग की दीवारें दिशा के अनुसार घर के सम्बंधित सदस्यों की बीमारी का कारण बनती हैं I</li>
<li>पूर्व दिशा की खिड़कियों में लगे शीशे ट्रांसपैरेंट अर्थात् पारदर्शी होने चाहिए नहीं तो हमेशा भ्रम और संशय की स्थिति बनी रहेगी I</li>
<li>पूर्व और उत्तर दिशा में हलके रंग के हलके परदे और दक्षिण और पश्चिम दिशा में गहरे रंग के भारी परदे रहने चाहिए I</li>
<li>घर के उत्तर, पूर्व और उत्तर-पूर्व दिशाओं में स्थायी रौशनी के होने से उस घर पर सदैव दैवी कृपा बनी रहती है I</li>
<li>दक्षिण और पश्चिम दिशाओं में घर के बाहर की तरफ जाती रोशनी राहु, शनि और मंगल सम्बन्धी परेशानियों से मुक्ति देती हैं I</li>
<li>चारदीवारी की ऊंचाई इतनी होनी चाहिए कि बाहर से गुजरने वाले घर के भीतर खिड़कियों से झाँक नहीं सकें और इसीलिए दीवारें घर की खिड़कियों को आधे से अधिक ढँक लें I</li>
<li>खिड़कियों के ऊपर लगे पेलमेट की डिजाइन उत्तर और पूर्व में सपाट और दक्षिण और पश्चिम में तिकोनाकार होनी चाहिए I</li>
<li>उत्तर और पूर्व दिशाओं में चारदीवारी पर लोहे की नुकीली कीलों, भालों या टूटे कांच के टुकड़ों से घेराबंदी नहीं करनी चाहिए, ऐसा उपाय सिर्फ दक्षिण और पश्चिम दिशाओं के लिए वास्तु सम्मत है I</li>
<li>उत्तर और पूर्व की दीवारें दक्षिण और पश्चिम की दीवारों से नीची होनी चाहिए I</li>
<li>मध्य उत्तर से मध्य पूर्व तक यदि भवन या भूमि में विस्तार है तो यह शुभ फल देने वाला है परन्तु अन्य दिशाओं में ऐसा विस्तार हो तो ताम्बे के तारों से, झाड़ियों से अथवा पिरामिड के प्रयोग से उस दोष का निवारण कर लेना ही उचित है I</li>
<li>कमरे में आलमारी को दक्षिण या पश्चिम दिशा में रखना उचित है परन्तु दर्पण लगे आलमारी को इन दिशाओं में रखने से धनहानि होने की संभावना होती है I</li>
<li>शयन कक्ष में हनुमान जी की फोटो नहीं रखनी चाहिए नहीं तो रात भर नींद में व्यवधान उत्पन्न होता है I पर्वत धारण किये हुए हनुमान जी की फोटो को कॉमन हाल में दक्षिण की दीवार पर लगाया जा सकता है I</li>
<li>पानी, नदी, समुद्र अथवा झील की पोस्टर्स को किसी भी कमरे की उत्तर या पूर्व की दीवार पर ही लगाना चाहिए I फिश एक्वेरियम के लिए भी यही स्थान उपयुक्त है I</li>
<li>दक्षिण-पूर्व के कोने में किचेन, जेनेरटर, इनवर्टर, बिजली के मीटर एवं पोल आदि होने चाहिए I इस कोने को समृद्ध बनाने के लिए एक लाल रंग का बल्ब भी लगाया जा सकता है I</li>
<li>दक्षिण-पश्चिम कोण रॉक गार्डेन, सीढ़ी, लिफ्ट आदि के लिए सबसे उपयुक्त होता है जो अभूतपूर्व यश प्रदान करता है I</li>
<li>पूर्व, उत्तर और उत्तर-पूर्व की दिशाओं में खाली जमीन यदि अधिक मूल्य में भी बिक रही हो तो उसे अवश्य खरीद लेना चाहिए, ऐसी जमीन भाग्यशाली को ही मिल पाती है I यदि कोई खाली जमीन दक्षिण, पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम कोने में मिल रही हो तो उसे मुफ्त में भी लेना भयंकर कष्टदायी होगा I</li>
<li>पूर्वोत्तर क्षेत्र में यदि कोई पोल, खम्भा या लम्बा वृक्ष हो तो उस स्तम्भ-वेध का निराकरण उस पर एक हाई वाट का बल्ब या वेपर लाइट अपनी तरफ करके लगाने से इसका पूर्ण निराकरण हो जाता है I ऐसे वेध का एक उपाय घर की बाहरी दीवार पर एक पाकुआ दर्पण या उत्तल दर्पण लगाने से भी हो जाएगा I</li>
<li>घर में दीमक,सांप, मकड़े, छिपकिली, लाल चींटियाँ, बिल्ली, चमगादड़ आदि का होना अशुभ है जबकि काली चींटी, नेवला, कुत्ता, तोता, गौरैया, बाज, मोर आदि शुभ हैं I</li>
<li>घर की सीमा के भीतर तुलसी, बेल, मनी प्लांट, कमल, शमी, अनार, मेहंदी, आम, नारियल, गुलाब एवं फूलों की अन्य किस्में, हरसिंगार, ब्राह्मी, अशोक, अश्वगंधा, मुसली, गिलोई, लेमनग्रास, पान, कपूर, सर्पगंधा शतावर, रक्त चन्दन,दालचीनी आदि शुभ वनस्पतियाँ हैं जबकि कैक्टस, पपीता, रबड़, आक, नीम्बू, बेर आदि घर की सीमा के अन्दर अशुभ वनस्पतियाँ हैं  I</li>
<li><strong>दैनिक क्रियाकलापों से संबंधित वास्तु-सुझाव &#8212; </strong>नीचे कुछ ऐसे कार्यों का वर्णन है जिनको हमें प्रतिदिन करना पड़ता है I इन दैनिक  कार्यों को करने के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण  वास्तु सुझाव दिए गए हैं I हालांकि इन सुझावों के विपरीत कार्य करने से तुरंत इनका दुष्प्रभाव नहीं दिखता है, फिर भी यदि लम्बे समय तक इनको नजरअंदाज किया जाय तो निश्चित रूप से इनके दुष्परिणाम नजर आयेंगे I मेरी व्यक्तिगत सोच यही है कि जब इन कार्यों को प्रतिदिन अनिवार्यतः हमें करना ही है तो क्यों नहीं अपने पूर्वजों के द्वारा प्राप्त अनुभवों के आधार पर प्रख्यापित नियमों पर ही अमल किया जाय और किसी संभावित परेशानी से अग्रिम बचाव कर लिया जाय I</li>
<li><strong>सोने की दिशा</strong> &#8212; उत्तर की ओर सिर करके कभी नहीं सोना चाहिए क्योंकि ध्रुवीय चुम्बकत्व के प्रभाव से  गहरी नींद नहीं आएगी जिसके कारण धीरे-धीरे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ख़त्म हो जायेगी और व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाएगा I रोगी व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ के लिए पूर्व की दिशा में सिर रखके सोना चाहिए I अच्छी नींद के लिए दक्षिण दिशा में सिर रखके सोना चाहिए I हालाँकि पश्चिम दिशा की ओर भी सिर करके सोया जा सकता है I</li>
<li><strong>खाने की दिशा </strong>&#8212; अच्छे स्वास्थ्य के लिए पूर्व की दिशा में मुंह करके खाना चाहिए I धन प्राप्ति के लिए पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके खाना उचित होगा I उत्तर की ओर मुंह करके खाने से व्यक्ति पर ऋण का बोझ बढ़ता है I सामान्यतः दक्षिण की ओर मुंह करके खाने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है, परन्तु गृहस्वामी के अलावे घर के किसी अन्य सदस्य को ऐसे खाना  नहीं खाना चाहिए I</li>
<li><strong>तरल पेय पीने की दिशा</strong> &#8212; कोई भी पेय पदार्थ जैसे पानी, जूस, दूध आदि पीने के लिये सर्वोत्तम दिशाएँ उत्तर, पूर्व एवम उत्तर-पूर्व हैं और वर्जित दिशाएँ दक्षिण, पश्चिम एवं दक्षिण-पश्चिम दिशाएँ हैं I स्नान करने के लिए भी इन्ही दिशाओं की ओर मुंह करना उचित होता है I</li>
<li><strong>पढने की दिशा &#8212; </strong>पढाई करने के लिये सर्वोत्तम दिशाएँ पूर्व, उत्तर और पूर्वोत्तर कोण ही हैं I उत्तर पश्चिम दिशा में मुंह करके पढाई करने से एकाग्र-चित्त होने में बाधा आएगी, दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके पढने से पढाई निष्फल जायेगी, दक्षिण या पश्चिम दिशा मे मुंह करके पढने से विलम्ब से कुछ भी समझ में आएगा और दक्षिण-पूर्व की दिशा में मुंह करके पढने से चित्त की चंचलता और उग्रता की बहुलता रहेगी I</li>
<li><strong>ध्यान साधना की दिशा</strong> &#8212; पूजा-अर्चना एवं ध्यान साधना के लिए चित्त की एकाग्रता और मन और मष्तिष्क में शीतलता अत्यंत आवश्यक होती है I घर का पूर्वोत्तर कोण जल का स्थान होने के कारण सबसे ठंढा होता है साथ ही देवगुरु बृहस्पति का कोना होने के कारण ज्ञान प्राप्ति एवं एकाग्रता से पूजा और ध्यान करने के लिए यह सर्वोत्तम दिशा है I यदि पूर्वोत्तर दिशा मे संभव नहीं हो तो पूर्व और उत्तर दिशाएँ भी इस हेतु अच्छी दिशाएँ होती हैं I</li>
<li><strong>ऑफिस में बैठने की दिशा</strong> &#8212; ऑफिस या कोई भी कार्यस्थल हमारे दैनिक क्रियाकलापों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है जहाँ हम अपने पूरे दिन का कम से कम एक तिहाई समय बिताते हैं I इस जगह पर भी यदि बैठने की वास्तु-सम्मत व्यवस्था कर ली जाय तो अपने सहकर्मियों एवं अधीनस्थों के साथ अच्छे तालमेल से हम निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के साथ-साथ पद के अनुरूप यश प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं I अतः ऑफिस में बैठने के लिए दक्षिण-पश्चिम कोने की दिशा में उत्तर, पूर्व या पूर्वोत्तर की ओर मुंह करके बैठना ही सही है जिससे सभी कार्य सुगमता से पूरे हो सकें और अपेक्षित सफलता मिल सके I ऑफिस के सामान्य कामकाज के अलावे यदि किसी महत्वपूर्ण अनुबंध () पर हस्ताक्षर करने के समय भी उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुंह रखना चाहिए अन्यथा दिशा से ही दशा बदलती है I</li>
<li><strong>शौच की दिशा</strong> &#8212; घर के शौचालय में शीट की व्यवस्था इस प्रकार से होनी चाहिए ताकि बैठते समय व्यक्ति का मुंह या तो उत्तर की ओर हो अथवा दक्षिण की ओर हो, पूर्व अथवा पश्चिम की दिशाओं की ओर मुंह करना इस कार्य हेतु वर्जित माना गया है I</li>
<li><strong>जल की व्यवस्था</strong> – घर में अथवा ऑफिस में भोजन से अधिक पानी की आवश्यकता महसूस होती है, इस हेतु वहां जल का स्थायी प्रबंध रहना चाहिए यह प्रबंध घर या ऑफिस के पूर्वोत्तर कोने में अथवा पूर्व या उत्तर दिशा में किया जा सकता है I</li>
</ul>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%b2-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%af/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पूजा कक्ष के वास्तु विधान</title>
		<link>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deepak]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Feb 2018 20:14:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Vaastu Tips in Hindi]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.joyvastu.com/?p=622</guid>

					<description><![CDATA[पूजा घर के रख-रखाव के मामले में बहुत सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि इसी स्थान से व्यक्ति को जीवन में दैवी कृपा से सभी प्रकार की खुशियाँ, सफलता, धन-धान्य की प्राप्ति होती है I इसमें हुई कोई त्रुटि जीवन को उतना ही दुखमय, निराशाजनक एवं क्लेशपूर्ण बना सकती है I पूजा स्थान को उत्तर-पूर्व दिशा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><img decoding="async" src="http://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/01/puja-room-one.jpg" /></p>
<p>पूजा घर के रख-रखाव के मामले में बहुत सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि इसी स्थान से व्यक्ति को जीवन में दैवी कृपा से सभी प्रकार की खुशियाँ, सफलता, धन-धान्य की प्राप्ति होती है I इसमें हुई कोई त्रुटि जीवन को उतना ही दुखमय, निराशाजनक एवं क्लेशपूर्ण बना सकती है I</p>
<ul>
<li>पूजा स्थान को उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में रखना चाहिए I</li>
<li>पूजा घर को हमेशा प्रकाशित रखना चाहिए, यदि प्राकृतिक प्रकाश की कमी हो तो बिजली के बल्ब से भी इसे हमेशा अँधेरे से मुक्त रखना चाहिए I सफ़ेद या पीले रंग के बल्ब इस स्थान के लिए उपयुक्त हैं I</li>
<li>पूजा घर की प्रतिदिन सफाई होनी चाहिए और इसे मकडी के जाले, धूल, गर्द, धब्बे, पपड़ियों, काई आदि से हमेशा मुक्त रखना चाहिए I ये सभी चीजें पूजा स्थान में राहु के प्रभाव को दर्शाती हैं जिनके कारण गुरु-चांडाल योग जैसा अशुभ योग बनता है I</li>
<li>देवी-देवताओं की फोटो के साथ पूर्वजों की फोटो को पूजा के स्थान पर रख कर एक साथ पूजा नहीं करनी चाहिए I पूर्वजों की फोटो का स्थान दक्षिण-पश्चिम की दक्षिणी दीवार होती है और दोनों को एक स्थान पर रख कर पूजा करने से देव-दोष और पितृ-दोष लगता है I अकारण सभी कार्यों में बाधा और फल प्राप्ति में विलम्ब का सामना करना पड़ सकता है I</li>
<li>रसोई घर में पूजास्थान रखना भी देवगुरु बृहस्पति और असुरगुरु शुक्राचार्य को एक साथ रखने जैसा है जिसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं I बृहस्पति संतानकारक ग्रह है और उसका रसोई घर में अर्थात् अग्नि के समीप होने से संतान-प्राप्ति में बाधा हो सकती है साथ ही अनावश्यक खर्च का भी योग होता है I</li>
<li>मूर्ति की पूजा का अलग विधान होता है जिसमे प्रतिदिन आरती, भोग और विसर्जन की विधियाँ शामिल होती हैं I ऐसा नहीं करने पर भी देव-दोष लगता है जिसके कारण कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है I चूंकि घर में पवित्रता के साथ इन सभी विधानों का पालन गृहस्थ धर्म के निर्वहन के साथ करना कठिन होता है अतः यथा संभव घर के पूजा स्थान में मूर्ति की पूजा से बचना चाहिए I डेकोरेशन के तौर पर मूर्तियों को वास्तु के नियमों के अनुकूल उचित स्थान पर रखा जा सकता है I</li>
<li>घर में पूजा स्थान को किसी हल्के रंग जैसे हल्के पीले, सफ़ेद, हल्के हरे, सुनहरे आदि रंगों से ही रंगना चाहिए I कभी भी काले, नीले, भूरे अथवा चितकबरे रंगों से नहीं रंगना चाहिए I बृहस्पति का रंग पीला होता है और इस स्थान को बृहस्पति के मित्र रंगों से ही रंगना शुभ फलदायी होता है I</li>
<li>पूजा के क्रम में सुबह को अर्पित किया हुआ फूल शाम को उतार के पूजा के स्थान को साफ़ कर देना चाहिए ताकि भगवान् बासी फूलों के साथ शयन नहीं करें I</li>
<li>पूजा के लिए देवी देवताओं की फोटो या पोस्टर फटे हुए या रूग्ण नहीं होने चाहिए नहीं तो लाभ के स्थान पर हानि होने की संभावना होती है I</li>
<li>पूजा स्थान को क्रिस्टल से निर्मित वस्तुओं से ऊर्जान्वित रखना चाहिए और उन क्रिस्टल की वस्तुओं की नमक पानी के घोल से नियमित रूप से सफाई होनी चाहिए ताकि उसमे जमी नेगेटिव इनर्जी को हटाके पॉजिटिव इनर्जी को बढाया जा सके I</li>
<li>पूजा घर में प्रयोग में लाये जाने वस्त्रों का रंग भी सफ़ेद अथवा पीला होना चाहिए और उसको भी नियमित अंतराल पर साफ करते रहना चाहिए I</li>
<li>पूजा स्थान में पारद शिवलिंग, दक्षिणावर्त शंख, एकाक्षी नारियल, स्फटिक श्रीयन्त्र, ईशान पात्र आदि शुभ वस्तुओं के होने और उनकी प्रतिदिन पूजा करने से पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है I</li>
<li>पूजा के स्थान में पूजा सामग्रियों को धोने के लिए उत्तर-पूर्व के कोने में पानी का नल होना चाहिए I</li>
<li>पूजा करते समय पूजा करने वाले का मुख पूर्व, उत्तर या उत्तर-पूर्व की दिशा में होना चाहिए I</li>
<li>पूजा में प्रयोग होने वाली सामग्रियों जैसे अगरबत्ती, माचिस, भोग-आरती की वस्तुओं आदि को पूजा के लिए बने लकड़ी के मंदिर के ऊपर अथवा देवी देवताओं के फोटो के ऊपर नहीं रखना चाहिए I प्रायः लोग ऊपर के स्थान को धार्मिक पुस्तकों से अथवा पूजा के लिए प्रयोग होने वाली सामग्रियों से भारी कर देते हैं जो वास्तव में देवी-देवता के सिर पर ही अनावश्यक बोझ का काम करता है I धार्मिक पुस्तकों को पूजा के स्थान के ही बगल में अलग से आसन पर रखना चाहिए I</li>
<li>पूजा के लिए जो भी सामग्री रखनी हो तो उसे पूजा स्थान के दक्षिण-पश्चिम कोने में रैक बनाकर रखा जा सकता है I सफाई के सामानों को भी रैक की ही दिशा में रखा जाना चहिये I</li>
<li>हवन करने के लिए हवन-कुण्ड को दक्षिण-पूर्व कोण में रखना चाहिए और हवन करते समय हवनकर्ता का मुख पूर्व और पुरोहित का मुख उत्तर की दिशा में होना चाहिए I</li>
</ul>
<p>पूजा के स्थान में रखे गए देवी-देवताओं की फोटो को जमीन की सतह से कुछ ऊपर शुभ लकड़ी से बनी  पीठ पर अथवा इस हेतु बनाए गए मंदिर में ही स्थान देना चाहिए और उनको भी उपयुक्त दिशा में ही रखा जाना चाहिए ताकि उनके श्रीमुख के दर्शन यथाविधि किये जा सकें जैसे; भगवान् श्रीराम के दरबार की फोटो को पूर्व की दीवार के सहारे, महादेव शिव के परिवार को उत्तर की दीवार पर, प्रथम पूज्य श्री गणेश और कार्तिकेय देवता को दक्षिण की दीवार से लगा के और रुद्रावतार हनुमान जी की फोटो को उत्तर-पूर्व कोने में इस प्रकार से रखना चाहिए ताकि उनकी दृष्टि दक्षिण–पश्चिम की दिशा में अर्थात राहु की दिशा में बनी रहे जिससे कि राहु नियंत्रण में रहे I श्री गणेश देव तथा कार्तिकेय देव की फोटो को उत्तर की दीवार पर भी रखा जा सकता है I लक्ष्मी-गणेश की फोटो को अथवा उनकी ९ अंगुल से छोटी प्रतिमा को उत्तर की दीवार से लगा के उनकी पूजा की जा सकती है I शक्ति की देवी मां दुर्गा एवं मां काली की फोटो को उत्तर या दक्षिण की दीवार पर रखा जा सकता है I शिक्षा और ज्ञान की देवी मां सरस्वती की फोटो को पूर्व की दीवार पर रखना चाहिए, पूर्व दिशा सूर्य की अर्थात् प्रकाश की दिशा है I ज्ञान ही प्रकाश है इसीलिए ज्ञान की देवी मां सरस्वती का स्थान पूर्व की दिशा में रखा गया है I विष्णु के सभी अवतारों की फोटो को जहाँ पूर्व की दिशा में स्थान देना चाहिए वहीँ रूद्र के अवतारों को उत्तर का स्थान देना चाहिए I कुछ लोग सर्व धर्म समभाव की भावना से पूजा घर में ही ईसा मसीह की भी फोटो अथवा उनकी सलीब पर लटकी मूर्ति को स्थान देते हैं जो देव पूजा के साथ मानव देवता की पूजा के समान होता है I ऐसा करना शास्त्र-सम्मत  नहीं माना जा सकता है क्योंकि जिस भी पूजा विधान को माना जाय उसका पूरी शुद्धता से पालन होना चाहिए I प्रायः हम पूजा के स्थान में देवी देवताओं के रौद्र रूप की भी पूजा करते हैं जैसे धराशायी महादेव पर मां काली के चरणों वाली प्रचलित और सर्वसुलभ फोटो अथवा नृसिंह अवतार में हिरण्यकश्यप वध की फोटो, परन्तु जहाँ एक ओर ये फोटो शांत मन को विचलित करते हैं वहीँ दूसरी ओर इनकी पूजा से किसी दैवी आशीर्वाद की उम्मीद नहीं की जा सकती I अतः पूजा कक्ष में देवी देवताओं के सौम्य और आशीर्वादी रूपों को ही पूजा के लिए रखना चाहिए I</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>दण्ड, कारावास और वास्तु-दोष</title>
		<link>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%a6%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deepak]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Feb 2018 18:38:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी खण्ड]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.joyvastu.com/?p=599</guid>

					<description><![CDATA[प्रायः हमने देखा है कि निर्दोष होते हुए भी किसी व्यक्ति को शासन की ओर से दण्डित किया जाता है अथवा जिस कम्पनी में वह काम करता है उस कम्पनी के डायरेक्टर का कोपभाजन बना रहता है, कभी-कभी तो किसी और की गलती के कारण सजा भी भोगनी पड़ जाती है I सरकारी कर्मचारियों को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter size-medium wp-image-600" src="http://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/02/handcuffs-350x213.jpg" alt="" width="350" height="213" srcset="https://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/02/handcuffs-350x213.jpg 350w, https://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/02/handcuffs.jpg 568w" sizes="(max-width: 350px) 100vw, 350px" /></p>
<p>प्रायः हमने देखा है कि निर्दोष होते हुए भी किसी व्यक्ति को शासन की ओर से दण्डित किया जाता है अथवा जिस कम्पनी में वह काम करता है उस कम्पनी के डायरेक्टर का कोपभाजन बना रहता है, कभी-कभी तो किसी और की गलती के कारण सजा भी भोगनी पड़ जाती है I सरकारी कर्मचारियों को तो और भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है जब किसी फाइल में हुई किसी छोटी सी चूक के कारण बाद में किसी बड़े घोटाले का पर्दाफाश होता है और उसमें  उस व्यक्ति की सीधी जिम्मेवारी तय करते हुए निलंबन, बर्खास्तगी आदि के साथ-साथ लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद उसको कारावास तक की सजा सुना दी जाती है I इससे न केवल उस व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होती है बल्कि आर्थिक हानि के साथ-साथ वह भावनात्मक रूप से भी टूट जाता है I कुछ मामलों में तो एक ही गलती के लिए जहाँ एक को बरी कर दिया जाता है वहीँ दूसरे को कठोर दण्ड दे दिया जाता है I इनकम टैक्स की छापेमारियां भी किसी के यहाँ बार –बार होती हैं और उसे   अकारण विभाग का अथवा पुलिस की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है जबकि उसके ही बराबरी का दूसरा बिजनेसमैन सुरक्षित रूप से अपना कारोबार करता रहता है I ऐसे अनेक मिलते-जुलते उदाहरण हम अपने आसपास देखते हैं जिसमे किसी को राज्य सरकार की विभिन्न एजेंसियों से परेशानियों का सामना करना पड़ता है और ऐसे में हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है कि हम इन घटनाओं को या तो उस व्यक्ति की करनी का फल मान लेते हैं या नहीं तो उसके भाग्य का दोष मान लेते हैं I यह सही है कि ऐसे मामलों में ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ग्रहों के गोचरवश राशि परिवर्तन का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है, परन्तु यदि अपने घर को वास्तु-नियमों के अनुकूल कर लिया जाय तो ऐसी आकस्मिक विपत्तियों से बचा भी जा सकता है या कम भी किया जा सकता है I जहाँ एक ओर प्रतिकूल ग्रह दशा होने की स्थिति में एक वास्तु सम्मत घर छाते की तरह बचाव करता है वहीं दूसरी ओर अनुकूल ग्रह दशा होने पर भी यदि घर में वास्तु-नियमों की अनदेखी की जाय तो वही घर अपेक्षित प्रगति में बाधक भी बन जाता है I</p>
<p>जिस तरह ज्योतिषशास्त्र के नियमों के अनुसार किसी एक घटना के घटित होने को कई ग्रहों के सम्मिलित प्रभाव के रूप में बताया जाता है उसी तरह से वास्तु-शास्त्र के अनुसार भी किसी एक घटना के लिये पूर्ण रूप से किसी एक ही दिशा या उप दिशा के दोष का प्रभाव नहीं होता बल्कि सभी दिशाओं में हुए अनेक दोषों का सम्मिलित असर होता है I उदाहरण के रूप में जिस प्रकार नदी का तटबंध उसी जगह से टूटता है जो जगह सबसे कमजोर होती है, उसी प्रकार अनेक वास्तु-दोषों के रहने पर भी कोई एक वास्तु-दोष ऐसा होता है जो किसी विशेष प्रभाव का मुख्य कारक हो जाता है I अनुभवों से ऐसा पाया गया है कि इन सभी समस्याओं के मूल में दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय कोण का बहुत व्यापक प्रभाव रहा है I इसीलिए अन्य दिशाओं और उप दिशाओं के दोषों के रहते हुए यदि दक्षिण-पूर्व की दिशा में दोषों का कुछ विशेष योग हो जाय तो ऊपर लिखी हुई बहुत सारी समस्याएं व्यक्ति के जीवन में घटित होने लगती हैं I दक्षिण-पूर्व दिशा का प्रभाव इन समस्याओं के मूल में होने के क्या कारण हैं इनको समझना बहुत आवश्यक है और इसके लिए सामान्य रूप से ग्रहों की प्रकृति, वास्तु नियमों के अनुसार ग्रहों के स्थान, प्रतीकात्मक वास्तुशास्त्र के अनुसार उस दिशा में होने वाले कुछ महत्वपूर्ण योगों तथा तात्विक वास्तु-शास्त्र के अनुसार उस स्थान के अधिपति अग्नि तत्व के प्रभावों को विश्लेषण का आधार बनाया जा सकता है I</p>
<p>जिस प्रकार ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सारे ग्रह किसी न किसी प्रभाव के नैसर्गिक या तात्कालिक कारक होते हैं I उसी प्रकार वास्तु शास्त्र के अनुसार भी घर की प्रत्येक दिशा अथवा कोण व्यक्ति के जीवन के किसी न किसी क्षेत्र को प्रभावित करते हैं I वैदिक ज्योतिष के अनुसार लग्न कुण्डली का बारहवां भाव अन्य प्रभावों के अतिरिक्त कारावास का भी सूचक होता है, उसी प्रकार से वास्तु शास्त्र के अनुसार व्यक्ति के घर का आग्न्येय कोण ( दक्षिण-पूर्व ) भी राजप्रियता, राजभय एवं राजदण्ड का कारक होता है I इस दिशा का स्वामी  शुक्र दाम्पत्य सुख का नैसर्गिक कारक होने के साथ व्यक्ति के लग्न कुंडली के जिन  भावों का भावाधिपति होता है, उन भावों का तात्कालिक कारक भी होता है I  इसके अतिरिक्त शुक्र का एक और महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि आग्न्येय कोण के अधिपति होने के कारण शुक्र राजप्रियता का भी कारक बन जाता  है I वैसे तो राजप्रियता से मतलब राजा का प्रिय होना होता है परन्तु आज के सन्दर्भ में व्यक्ति का अपने उच्चाधिकारियों से अच्छा सम्बन्ध होना भी राजप्रियता ही कहलाता है I</p>
<p>अतः यदि दक्षिण-पूर्व कोने को वास्तु नियमों के अनुरूप रखा जाय तो निर्दोष होने की स्थिति में इससे सरकार अथवा  उच्चाधिकारियों से सम्बंधित परेशानियों से काफी हद तक मुक्ति मिल सकती है I परन्तु जैसा कि पूर्व में भी बताया गया है कि कोई एक प्रभाव अनेक ग्रहों के प्रतिकूल होने की स्थिति में ही फलित होता है भले ही मुख्य अथवा तात्कालिक कारक कोई एक ही ग्रह हो I जैसे ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) के दूषित होने की स्थिति में देवगुरु बृहस्पति के नैसर्गिक कारकत्व के बाधित होने से  अन्य प्रभावों के अतिरिक्त यह यश-प्रतिष्ठा में बाधा उत्पन्न करता है, वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) का कोना जो मित्र और शुभचिंतकों का कारक है, दूषित होने की स्थिति में शत्रुता को बढाता है और शुभचिंतक भी शत्रुवत व्यवहार करने लगते हैं, नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) के वास्तु दोष के फलस्वरूप दिशा स्वामी राहु जो अभूतपूर्व सफलता और उन्नति का कारक है, उतना ही विपरीत फल देता है I इसीलिए हम कह सकते हैं कि राजप्रियता में कमी मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व कोण के दोषों के कारण तो होती ही है साथ ही अन्य दिशाओं और कोनों का भी इसमें उतना ही महत्व रहता है I राज्य अथवा उच्चाधिकारियों से होने वाली परेशानियां दक्षिण-पूर्व कोण के दोषों के अलावे उस व्यक्ति के घर में होने वाली अन्य वास्तु विसंगतियों के सम्मिलित प्रभावों के कारण होती हैं I ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी की लग्न कुंडली में शुक्र उच्च का हो अथवा अच्छे भावों का स्वामी हो तो गोचर के प्रभाव से और विन्शोत्तरी दशा  के कारण उस व्यक्ति को राजप्रियता का फल प्राप्त होता है I उसी प्रकार वास्तु-शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के घर अथवा फैक्ट्री के दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय कोण में वास्तु-सम्मत निर्माण जैसे किचेन, जेनेरटर, बिजली का पोल, ट्रान्सफार्मर, बिजली का मीटर, ब्यॉयलर, फरनेस आदि हो तो उसका शुक्र अच्छा माना जाएगा और व्यक्ति को राजप्रियता का फल प्राप्त होता है I ऐसे शुभ फल की प्राप्ति के लिए घर की छत पर लगा सोलर प्लांट भी इसी दिशा में होना आवश्यक है I</p>
<p>दक्षिण-पूर्व में शुक्र के प्रतिनिधि वृक्ष जैसे अनार, आंवला, मनीप्लांट का होना भी व्यक्ति के शुक्र को बलवान बनाता है परन्तु इसमें कोण-सूत्र का ख़याल रखना आवश्यक है अन्यथा इसका दुष्प्रभाव भी हो सकता है I</p>
<p>परन्तु इस दिशा में जलश्रोत का होना, गड्ढे होना, सीढ़ियों का होना एवं इस कोने का बढ़ा होना निश्चित रूप से इस दिशा को वास्तु दोषों से युक्त बनाता है और ऐसा होने पर अन्य प्रभावों के अतिरिक्त व्यक्ति को राज दण्ड अर्थात कानूनी पचड़ों में फंसना पड़ता है I दक्षिण-पूर्व के पूर्वी दिशा से यदि कोई रास्ता घर तक उसी स्थान पर समाप्त हो जाता है तो ऐसे मार्ग प्रहार के कारण व्यक्ति के कारावास की भी संभावना बढ़ जाती है, उसी प्रकार वायव्य (उत्तर-पश्चिम) कोण की उत्तरी दीवार पर यदि कोई रास्ता आकर समाप्त हो जाय तो व्यक्ति को बंधन भय अर्थात कारावास का भय सताता है और यदि इस स्थान को काले रंग से रंग दिया जाय तो राहु का रंग होने के प्रभाव से ग्रहण योग बनता है और शत्रुओं में काफी वृद्धि हो जाती है जो भविष्य में दण्ड या कारावास का द्वार खोलते हैं I भूमि के आग्न्येय कोण के बढे होने के कारण भूमि में अग्नि तत्व की वृद्धि हो जाती है जिससे व्यक्ति में उग्रता बढ़ जाती है और इसके परिणामस्वरूप लड़ाई झगड़े की प्रवृत्ति बढती है I परिणाम यह होता है कि लड़ाई झगडा होने की स्थिति में पुलिस एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण कानूनी उलझनों का भी सामना करना पड़ता है I इसका असर तब और भी गंभीर हो जाता है यदि नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में भी वृद्धि हो और राहु के बढे  प्रभाव के कारण व्यक्ति में हिंसक प्रवृत्ति भी बढ़ जाती है और तब इसका भयंकर दुष्परिणाम भोगना पड़ सकता है I यदि घर के आग्न्येय कोण में सीढ़ीघर के ऊपर पानी की टंकी रखी गयी हो तो शुक्र, राहु और चन्द्रमा की अनिष्टकारी युति के कारण भी दंड अथवा कारावास का योग बन सकता है I इसके अलावे ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में यदि पांच महादोषों में से कोई दो महादोष भी मिल जाएँ तो भी दण्ड या कारावास की संभावना बन जाती है I यहाँ तक कि ईशान कोण में सेप्टिक टैंक का होना भी अन्य दुष्प्रभावों के अतिरिक्त कारावास की संभावना बनाता है I</p>
<p>इसीलिए यदि किसी को राज्य पक्ष से अथवा उच्चाधिकारियों से शुरूआती परेशानियां महसूस हो रही हों तो निश्चित रूप से वास्तु-सम्मत संरचनात्मक सुधारों के द्वारा अथवा पिरामिड के उचित प्रयोगों से अथवा ताम्बे के तारों की घेराबंदी से या ऐसी ही किन्ही अन्य शास्त्रोक्त विधियों से अपने घर का वास्तु उपचार करवा लें अन्यथा बाद में यही विकराल रूप धारण कर सकता है I</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>रोग और वास्तु-लक्षण</title>
		<link>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a3/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deepak]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 01 Feb 2018 07:33:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी खण्ड]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.joyvastu.com/?p=582</guid>

					<description><![CDATA[प्रायः हमलोग किसी रोग के होने पर उसके उपचार के  विभिन्न प्रयासों में जुट जाते हैं I इन प्रयासों के रूप में हम रोग के लक्षणों के आधार पर तुरंत डॉक्टर से मिलकर ब्लड टेस्ट और ट्रीटमेंट आदि शुरू कर देते हैं  I हमारी मानसिकता ऎसी हो गयी है कि एक बार रोग के लक्षण [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>प्रायः हमलोग किसी रोग के होने पर उसके उपचार के  विभिन्न प्रयासों में जुट जाते हैं I इन प्रयासों के रूप में हम रोग के लक्षणों के आधार पर तुरंत डॉक्टर से मिलकर ब्लड टेस्ट और ट्रीटमेंट आदि शुरू कर देते हैं  I हमारी मानसिकता ऎसी हो गयी है कि एक बार रोग के लक्षण प्रकट होने के बाद हम उसके शीघ्र और पूर्ण निराकरण  के लिए जुट जाते हैं I रोगों की गंभीरता के आधार पर हम एलोपैथी, नेचरोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी और यहाँ तक कि तंत्र-मंत्र और पूजा विधानों का सहारा लेने से भी नहीं परहेज करते हैं I इन सभी उपायों को करने में हम कभी यह नहीं देखते कि लोग जानेंगे तो क्या कहेंगे बल्कि  हमारा पूरा ध्यान रोग-मुक्ति पर ही केन्द्रित रहता है I कई मामलों में ऐसा पाया गया है कि रोगों के इलाज़ के क्रम में दवाइयाँ भी लम्बे समय तक असरदार नहीं रहती और रोग पुनः अपने लक्षण दिखाने लगता है I ऐसे समय में ये देखना बहुत ही आवश्यक हो जाता है कि उन रोगों का कारण कहीं और भी तो नहीं है ? यह जानना जरूरी है कि खान-पान में होने वाली असावधानियाँ, व्यायाम का अभाव या समुचित दिनचर्या के पालन में शिथिलता के अतिरिक्त वास्तु-दोष भी उन रोगों के होने के अहम कारण हो सकते हैं I वास्तु-दोष किसी रोग के होने या बने रहने के लिए उसी प्रकार महत्वपूर्ण हैं जिस प्रकार से किसी बर्तन की तली में कोई छेद, जो उस बर्तन में ऊपर से डाले गए सारे पानी को अंत में खाली कर देता है I उसी तरह से जब घर में किसी को कोई रोग हो जाता है तो दवाइयां भी अस्थायी तौर पर तभी तक असर करती हैं जबतक उनका प्रभाव रहता है, घर मे पाये जाने वाले वास्तु दोषों के कारण इससे उनका स्थायी निदान नहीं हो पाता है I परन्तु यदि घर का वास्तु-उपचार भी करवा लिया जाय तो जहाँ एक ओर काफी हद तक बीमारी से बचा जा सकता है, वहीँ दूसरी ओर यदि बीमारी हो चुकी हैं तो उन बीमारियों का इलाज़ एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी अथवा कोई भी अन्य विधि से कराते रहने पर कारगर भी हो सकता है I</p>
<p>जिस प्रकार आधुनिक मेडिकल साइंस के मुताबिक एक साधारण बुखार या खांसी के भी कई कारण हो सकते हैं, उसी प्रकार घर के किसी सदस्य को होने वाली बीमारी भी कई वास्तु-दोषों के सम्मिलित प्रभाव से होती हैं I  किसी एक वास्तु-दोष का प्रभाव न सिर्फ रोग या बीमारी बल्कि घर में होने वाली कई अन्य समस्यायों पर भी दिखता हैं I यही कारण है कि किसी सदस्य की रोग-व्याधि के वास्तु-लक्षण उस घर को समग्रता से और अच्छी तरह से देखने पर ही पता चल सकते हैं I परन्तु उन बीमारियों को जानने के कुछ सामान्य लक्षण भी हैं जिनको समझने के लिए किसी विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं होती है I पर उसके पूर्व यदि किसी की बीमारी के बारे में समझना हो तो उस सदस्य की परिवार में स्थिति को समझना आवश्यक है जैसे, गृहस्वामी है या गृहस्वामिनी, बेटा है या बेटी, उस बीमार व्यक्ति का गृहस्वामी से क्या सम्बन्ध है आदि I ऐसा करना इसीलिए आवश्यक होता है क्योंकि जिस प्रकार ज्योतिष शास्त्र में जातक के लग्न के आधार पर उसके सभी सगे-सम्बन्धियों के बारे में मालूम किया जा सकता है, उसी प्रकार से वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार प्रत्येक दिशा और कोण घर के किसी न किसी सदस्य का प्रतिनिधित्व करते हैं I इसी आधार पर उस घर के किसी विशेष दिशा या कोण में उत्पन्न दोषों के आधार पर उस सदस्य की बीमारी का आकलन तथा उसके उपचार का प्रयास किया जा सकता है I घर एवं भूमि की दिशा एवं कोण के अनुसार वास्तु-दोषों का प्रभाव परिवार के किसी सदस्य पर दिखता है, जैसे ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में उत्पन्न हुए वास्तु-दोष का प्रभाव उस घर के प्रथम पुत्र संतान एवं गृहस्वामी पर पड़ता है I यद्यपि गृहस्वामी के स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) से है, तथापि सामान्यतः सभी प्रकार की शारीरिक समस्यायों के मूल में ईशान कोण के दोषों का प्रभाव अवश्य देखा गया है I</p>
<p>प्रायः लोगों में ऐसी भ्रान्ति होती है कि वास्तु-सम्मत गृह-निर्माण करवाने के बावजूद उसमे रहने पर विभिन्न प्रकार के शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ा या वास्तु-सम्मत घर में रहने पर भी कई तरह के रोग हो गये I इससे उनका वास्तु-शास्त्र पर से विश्वास कम हो जाता है I परन्तु यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि ऐसा प्रभाव या तो आधे-अधूरे वास्तु नियमों का पालन करने के कारण होता है या ऐसा प्रभाव काफी लम्बे समय तक किसी घर में रहने के कारण उस घर की दीवारों में होने वाली टूट-फूट और उसकी तुरंत मरम्मत नहीं करवा पाने के कारण उत्पन्न वास्तु-दोषों के कारण भी हो सकता है I</p>
<p>इसीलिए कुछ मुख्य वास्तु-दोष जिनके आधार पर रोगों के बारे में पता चल सकता है, उन्हें दिशाओं एवं कोणों के दोषों के रूप में समझना आवश्यक है, ताकि वास्तु-सम्मत घर में रहने के बावजूद समय-समय पर आवश्यकतानुसार उनकी मरम्मत करायी जा सके I</p>
<p><strong>ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)</strong></p>
<p>घर के प्रथम पुत्र संतान पर ईशान कोण का बहुत ज्यादा प्रभाव देखा गया है I इस उपदिशा में होने वाले किसी दोष का अन्य प्रभावों के अलावे प्रथम पुत्र संतान के खराब स्वास्थ्य का कारक भी होता है I इस उपदिशा  मे सीढ़ी होने से उसके शारीरिक अथवा मानसिक रूप से बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है I उत्तर-पूर्व में गन्दगी वाली चीजें अथवा निर्माण होने के कारण उधर से आने वाली ऊर्जा में किसी तरह की अशुद्धि होती है तो उसका असर पूरे परिवार के खराब स्वास्थ्य के रूप में झलकता है I उस दिशा में टॉयलेट या कबाड़ी  होने से भी स्वास्थ्य पर ख़राब   असर होता है I</p>
<p><strong>आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व)</strong></p>
<p>इस उपदिशा में होने वाले दोषों का सीधा असर घर की महिलाओं और दूसरी संतान पर पड़ता है I अगर ऐसे किसी सदस्य की बीमारी का कारण खोजना हो तो उस दिशा में होने वाले वास्तु-दोषों को खोजना आवश्यक हो जाता है I अगर इस दिशा में घर की छत को आगे बढ़ा के चहारदीवारी तक मिला दिया जाय तो इस रूप परिवर्तन का भयंकर दुष्परिणाम उस घर की महिला की मृत्यु तक के रूप में भी मिल सकता है I इस दिशा में यदि पानी का श्रोत सीढ़ी के नीचे हो जाय तो पेट की समस्या के साथ-साथ सर्जरी की भी संभावना हो सकती है I</p>
<p><strong>नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम)</strong></p>
<p>गृहस्वामी की बीमारी का कारण इस उपदिशा में पाए जाने वाले दोषों से सीधे तौर पर जुडा होता है I अगर इस दिशा में कोई दोष होता है तो उससे होने वाले बाकी प्रभावों की तुलना में शारीरिक कष्ट का असर कुछ ज्यादा ही गंभीर होता है I इस दिशा के दोष घर के सदस्यों की असामयिक मृत्यु के भी कारण हो सकते हैं I इस दिशा में यदि किचन हो तो उस घर की महिला को भी कई प्रकार के रोगों का सामना करना पड़ता है I इसलिए इस दिशा-दोष को शीघ्र ही किसी योग्य वास्तुशास्त्री के निर्देश में दूर करवा लेना चाहिए I</p>
<p><strong>वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) </strong></p>
<p>इस उपदिशा के किसी भी दोष का सीधा असर घर की माता और तीसरी संतान पर होता है I इसके अलावे यदि इस दिशा की छत को आगे बढ़ा के चहारदीवारी से मिला दिया जाय तो इस रूप परिवर्तन का बहुत ही भयंकर परिणाम भोगना पड़ता है और इसके कारण गृहस्वामी की कष्टदायक मृत्यु भी हो सकती है I अगर इस दिशा में किचेन हो तो घर की महिला को हाई ब्लड-प्रेशर होने की संभावना भी रहती है I उनको पथरी (स्टोन) या गैस की परेशानी भी हो सकती है I</p>
<p><strong> </strong><strong>वास्तु-दोषों के लक्षण </strong></p>
<p>घर की दीवारों में आई <strong>दरारें </strong>उस घर के सदस्यों को होने वाली बीमारियों की ओर बहुत स्पष्ट इशारा करती हैं I अगर घर की दीवारों में किसी प्रकार की दरार उसकी दक्षिण दिशा में होती हैं तो इसका असर उस घर की महिला के ख़राब स्वास्थ्य के रूप में झलकता है I इसी तरह से अगर घर की पश्चिम की दीवार में दरारें हो जाती हैं तो इसका असर उस घर के पुरुष सदस्य के रोग के रूप में दिखता है I</p>
<p>ऐसा देखा गया है कि दीवारों में स्थायी नमी के कारण उनके प्लास्टर भी उखड़ने लगते हैं I सामान्यतः लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि ये गंभीर वास्तु-दोष की ओर इशारा करते हैं I इन <strong>उखड़े प्लास्टर </strong>अथवा <strong>दीवारों की पपड़ियों </strong>का सीधा असर घर के लोगों के ख़राब स्वास्थ्य के रूप में दिखता है I</p>
<p>घर में <strong>टूटे-फूटे शीशों</strong> का होना भी रोग को निमंत्रण देने जैसा काम है I अगर घर की <strong>खिड़कियों के शीशे</strong> फूट जाएँ तो उनको जल्दी से बनवा लेना चाहिए नहीं तो दिशा के अनुसार इन फूटे शीशों का दुष्प्रभाव घर के किसी न किसी सदस्य को भोगना पड़ता है I</p>
<p>इसी तरह से घर में लगी <strong>बंद घड़ी</strong> भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की ओर इशारा करती हैं I</p>
<p>जगह की कमी और शहरीकरण के कारण आजकल लोगों को अपार्टमेंट में रहने की बाध्यता होती जा रही है I परन्तु अपार्टमेंट में बनाये गए फ्लैट में एक तो हरेक फ्लैट में वास्तु के नियमों का पालन संभव नहीं होता और वहीँ दूसरी तरफ बिल्डर कम समय में फ्लैट को हैण्डओवर करने की जल्दबाजी में और अपनी सुविधा के अनुसार दीवार बनाने के बाद उसमे चौखट और किवाड़ लगाते हैं I दीवार के साथ ही चौखट जाम नहीं करने के कारण कुछ समय के बाद दीवारों और चौखट के बीच के स्थान में गैप हो जाता है जो एक दरार के रूप में ही दिखता है I भद्दा लगने के साथ-साथ इनका भी असर दीवार की दरारों की तरह ही होता है और इनके कारण भी घर के सदस्यों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है I</p>
<p>घर की <strong>दक्षिण दिशा में जल का स्थान</strong> होने के कारण भी महिलाओं की सेहत ख़राब रहती है I चाहे बोरिंग हो या चापाकल, तालाब हो या स्विमिंग पूल, यहाँ तक कि घर के उपयोग के बाद बाहर निकलने वाला पानी भी यदि दक्षिण दिशा से निकलता है तो इसका सीधा असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर ही पड़ता है I</p>
<p>उसी तरह अगर <strong>घर के पश्चिम दिशा में जल का स्थान</strong> हो तो इसका असर घर के पुरुषों के स्वास्थ्य पर पड़ता है I घर की सारी पूँजी मेडिकल बिल भुगतान में ही निकल जायेगी I इसीलिए जहाँ तक संभव हो जल-श्रोत को दक्षिण या पश्चिम दिशा में नहीं रखना चाहिए I जल के स्थान का मतलब जमीन पर के <strong>अंडरग्राउंड</strong> जल के स्थान से है नाकि घर की छत पर के जल के स्थान से I घर की छत पर अर्थात <strong>ओवरहेड</strong> वाटर टैंक के लिए सबसे उपयुक्त स्थान दक्षिण, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशा ही है I</p>
<p>रोगों के होने का एक महत्वपूर्ण कारण जो सामान्यतःलोगों की नज़रों से ओझल रहता है और वो है घर या जमीन की ढाल I <strong>ढाल अर्थात स्लोप</strong> का घर के सदस्यों के स्वास्थ्य पर बहुत ही व्यापक असर होता है I वास्तु-शास्त्र में इसे <strong>प्लवदोष</strong> के रूप में बताया गया है I जमीन की ढाल, घर के अन्दर के फ्लोर की ढाल और घर की छत की ढाल सबका महत्व और प्रभाव रोगों के कारण के रूप में दिखता है I अगर घर की, जमीन की या छत की ढाल दक्षिण की ओर होती है तो इससे भी घर की महिलाओं को किसी न किसी प्रकार की शारीरिक परेशानियों से गुजरना पड़ता है I उसी तरह से यदि जमीन की, घर के अन्दर की या छत की ढाल पश्चिम की ओर हो तो उस घर के पुरुष सदस्यों को शारीरिक परेशानियां होती रहती हैं I परन्तु यदि घर अथवा जमीन अथवा छत की ढाल दक्षिण-पश्चिम की तरफ हो तो ये विनाशकारी हो सकता है और इसका शारीरिक दुष्प्रभाव घर के सभी सदस्यों को भोगना पड़ सकता है और इसका तुरंत उपाय करना आवश्यक है I</p>
<p>वास्तु-शास्त्र में रंगों का भी बहुत महत्व है I <strong>रंगों के उचित प्रयोग</strong> से बहुत सारे वास्तु-दोषों का निराकरण भी संभव हो सकता है I  ज्योतिषशास्त्र में भी प्रत्येक रंग के लिए एक प्रतिनिधि ग्रह का प्रावधान किया गया है I किसी भी दिशा अथवा कोनों के कमरे को उसके प्रतिनिधि ग्रहों के मित्र रंगों के बदले शत्रु रंगों से सजाने से भी घर में रोगों का सामना करना पड़ता है I उसी तरह से जैसे किसी स्थान के वास्तु-दोष को <strong>दोष-निवारक रंगों</strong> के इस्तेमाल से दूर किया जा सकता है I इसीलिए घर को सुन्दर बनाने की बजाय घर को अच्छा बनाने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है I सुन्दर घर देखने में सबको पसंद आ सकता है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि उसमे रहने वाले भी सुखी हों, लेकिन अच्छा घर उसमे रहने वालों के लिए धन-धान्य से परिपूर्ण और सुखद होता है I यदि किसी योग्य आर्किटेक्ट के निर्देश में घर बनवाया जाय तो घर सुन्दर दिखने के साथ साथ अच्छे प्रभावों को देने वाला भी बन सकता है I</p>
<p><strong>घर या भूमि के विस्तार</strong> का भी स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का कारण हो सकता है I अतः ऐसे किसी भी विस्तार के पूर्व निश्चित रूप से किसी वास्तु विशेषज्ञ से सलाह ले लेनी चाहिए अन्यथा इसके बहुत ही घातक परिणाम मिल सकते हैं I जहाँ एक ओर दक्षिण दिशा को उत्तर दिशा से आने वाली जैविक ऊर्जा का क्षय स्थान माना गया है वहीँ दूसरी ओर पश्चिम दिशा को पूर्व दिशा से आने वाली प्राणिक उर्जा का क्षय स्थान माना गया है I इसीलिए दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा का कोई भी विस्तार उस क्षरण के प्रभाव की वृद्धि करने वाला होता है I दक्षिण दिशा में घर या भूमि का विस्तार उस घर की महिलाओं के लिए अहितकर होता है और पश्चिम दिशा का ऐसा कोई विस्तार घर के पुरुष सदस्यों के लिए बुरा प्रभाव देने वाला होता है I दक्षिण-पश्चिम का कोना ऐसे किसी भी विस्तार के मामले में घर के सभी सदस्यों के लिए स्वास्थ्य सम्बन्धी अत्यंत गंभीर परिणाम दे सकता है चाहे ऐसा विस्तार दक्षिण दिशा में अथवा पश्चिम दिशा में किया गया हो I</p>
<p>हालाँकि रोगों के होने या उनके ठीक नहीं हो सकने के बहुत सारे कारणों की यहाँ चर्चा की गयी है, फिर भी घर के किसी सदस्य के बीमार होने की स्थिति में अन्य इलाजों के साथ-साथ किसी योग्य वास्तुविद से भी सम्पूर्ण घर का वास्तु-सुधार करवा लेना उचित है ताकि सारे उपाय सार्थक हो सकें और बीमारियों का पूर्ण और स्थायी निदान हो जाय I</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वास्तुशास्त्र की प्रासंगिकता</title>
		<link>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deepak]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jan 2018 10:38:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी खण्ड]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.joyvastu.com/?p=557</guid>

					<description><![CDATA[जहां हम रहते हैं  उस स्थान को वास कहा जाता है  जो  संस्कृत भाषा की  क्रिया वस्  से लिया गया है। इस  प्रकार वास स्थान  के अध्ययन को ही वास्तुशास्त्र कहा जाता है।  हमारे निवास  को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक ऊर्जाओं  में भौगोलिक ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा , चंद्र ऊर्जा और विभिन्न ब्रह्मांडीय ऊर्जा हैं जो खगोल में स्थित ग्रहों एवं तारों से प्राप्त होती हैं। वस्तुतः वास्तुशास्त्र का [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: center;"></h3>
<p>जहां हम रहते हैं  उस स्थान को <strong><em>वास</em></strong> कहा जाता है  जो  संस्कृत भाषा की  क्रिया<em> </em><strong><em>वस्</em></strong><strong><em> </em></strong> से लिया गया है। इस  प्रकार वास स्थान  के अध्ययन को ही वास्तुशास्त्र कहा जाता है।  हमारे निवास  को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक ऊर्जाओं  में भौगोलिक ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा , चंद्र ऊर्जा और विभिन्न ब्रह्मांडीय ऊर्जा हैं जो खगोल में स्थित ग्रहों एवं तारों से प्राप्त होती हैं। वस्तुतः वास्तुशास्त्र का मुख्य उद्देश्य इन ऊर्जाओं के सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाने और उनके नकारात्मक  प्रभावों  को कम करने से सम्बन्धित है । मेरे वास्तु विजिट्स के दौरान  अक्सर मुझसे यह प्रश्न किया जाता है कि वास्तुशास्त्र वैज्ञानिक शास्त्र  है या नहीं ?  वस्तुतः मेरे दृष्टिकोण से  वास्तव में यह जीवन जीने की विधि है जो हमें ये बताती है कि कैसे  ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ तारतम्यता स्थापित करके  रहा जा सकता है ।  हमारे प्राचीन वैदिक पुस्तक अथर्ववेद के उप वेद स्थापत्य वेड  में इन्ही तथ्यों का सम्यक विश्लेषण किया गया है कि   ब्रह्माण्ड से प्राप्त  ऊर्जाओं के अच्छे प्रभाव को तालमेल के माध्यम से कैसे बढ़ाया जा सकता है I हमारे प्राचीन वैदिक ग्रंथों के स्थापित सिद्धांतों पर हमारे घरों का निर्माण और डिजाइन करने की प्रासंगिकता ही इस आलेख की विषयवस्तु है  ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-559" src="http://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/01/vastupurush.jpg" alt="" width="334" height="341" /></p>
<p>वास्तुशास्त्र हमें न केवल  वास्तुसम्मत विधियों के आधार पर खुशहाल जीवन जीने के लिए घर के निर्माण और डिजाइन से सम्बंधित विस्तृत और जटिल दिशा निर्देश बताता है बल्कि  हमें यह भी  बताता है कि अच्छी नींद के लिए बिस्तर पर सोने का तरीका क्या हो ; पूजा कैसे की जाय कि अधिकतम दिव्य आशीर्वाद प्राप्त हो सके ; कैसे अपने पड़ोसी और रिश्तेदारों के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाया जा सके ; बेहतर प्रदर्शन के लिए कार्यालय में कैसे बैठा जाय;  कैसे हमारे अधीनस्थ और सहयोगी कार्यालय में हमें सम्मान दें; कैसे रोग और घरेलू कलह को समाप्त किया जाय और कैसे स्वास्थ्य, धन और खुशी प्राप्त करते हुए  घर के आभामंडल  को मजबूत किया जाय ?</p>
<p>क्या आपने कभी गौर किया है कि ,</p>
<p>घर  में बंद दीवार घडी आपके घर के नौकरों और नौकरानियों से संबंधित समस्याओं को जन्म देती है ?</p>
<p>खिड़की के टूटे कांच दुर्भाग्य और रोग के सूचक हैं ?</p>
<p>दरवाजे के कब्जों  की आवाजें वैवाहिक संबंधों में दरार पैदा कर सकती हैं ?</p>
<p>घर के पूर्वोत्तर कोने में रखे झाड़ू या कचरा घरेलू झगड़े के लिए जिम्मेदार है ?</p>
<p>घर की दीवारों की दरारें सदस्यों की बीमारियों का कारण  हैं ?</p>
<p>किसी भी वास्तु शास्त्री के लिए ये कुछ महत्वपूर्ण संकेत हैं, जिनके माध्यम से उन्हें उस घर की परेशानियों  का अंदाज हो जाता है।  घर, ऑफिस,फैक्टरी या अन्य स्थानों से सम्बंधित विभिन्न समस्याओं का निदान करने के लिए इन्हें समान रूप से प्रासंगिक माना गया है।  वास्तुशास्त्र की अवधारणा  जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और आकाश तत्वों से प्राप्त होने वाली ऊर्जाओं और उनके प्रभावों के सूक्ष्म अध्ययन से सम्बंधित है I इसमें दिशाओं और उपदिशाओं को पांच तत्वों और उनके पारस्परिक संबंधों के आधार पर विश्लेषित किया गया है I ये दिशाएँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण हैं, जबकि उपदिशायें उत्तर-पूर्व (ईशान),, उत्तर-पश्चिम(वायव्य), दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), दक्षिण- पूर्व (आग्नेय) और केंद्र (ब्रह्मस्थान) हैं I इन तत्वों के पारस्परिक सम्बन्ध से उत्पन्न प्रभावों और उनके निदान के लिए ही आज के आधुनिक युग में भी वास्तुशास्त्र की प्रासंगिकता  बनी  हुयी  है I</p>
<p>घर को प्राचीन वैदिक काल से  ही चेतन माना गया है। यही कारण है कि हम अपने सभी धार्मिक गतिविधियों में वास्तु देवता को अनिवार्यता के साथ स्थान देते हैं और उनकी पूजा करते हैं । यह हमारे वैदिक अनुष्ठानों में , ईंट, सीमेंट, स्टील, बालू आदि से निर्मित ढ़ांचा मात्र नहीं , बल्कि एक जीवंत इकाई के रूप में देखा जाता है I इसी कारण से पौराणिक मान्यताओं के अनुसार <strong><em>वास्तु पुरुष</em></strong>  के पैर( खंभे) सीधे खड़े और आगे बढ़ने के लिए,आँखें (खिड़कियाँ) बाहर की दुनिया को देखने के लिए, नाक (वेंटिलेटर) साँस लेने के लिए और मस्तिष्क (उत्तर-पूर्व का खुलापन)  सोचने और अपनी रचनात्मकता व्यक्त  करने आदि के रूप में माना गया है और यही कारण है कि वास्तु नियमों के अनुसार घर में खंभे और खिड़कियां युग्म संख्या में होनी चाहिए (जोड़ी का प्रतीक ) ; यही कारण है कि दीवारों पर बिना आवश्यकता के कांटी नहीं होनी चाहिए जो वास्तुपुरुष के शरीर  में चुभन और  दर्द पहुंचाते हैं और जिनका प्रभाव घर में रहने वालों को भी भोगना पड़ता है; जंग और दीवारों की दरारें वास्तुपुरुष के घाव की तरह मानी जाती हैं जो धीरे-धीरे परिवार के सदस्यों के रोग का कारण बनती हैं ।</p>
<p>वैदिक साहित्य में संभवतः मानवीकरण की ऐसी व्यवस्था धर्म प्रधान हिन्दू समाज में अधिक स्वीकार्यता दिलाने के लिए की गयी थी और विभिन्न देवताओं के निवास के साथ इसे  जोड़ दिया गया; जैसे पूर्वोत्तर में भगवान शिव का स्थान है , दक्षिण में यम देवता अर्थात् मृत्यु देवता का वास है; पूर्व दिशा  भगवान सूर्य के लिए और पश्चिम दिशा में वरुण देव का स्वामित्व माना गया आदि I</p>
<p>इसी प्रकार से सौरमंडल के नवग्रहों का स्थान भी वास्तुशास्त्र में सभी दिशाओं और उपदिशाओं पर निर्धारित किया गया है I ईशान कोण में देवगुरु बृहस्पति, पूर्व में सूर्य,आग्नेय में शुक्र, दक्षिण में मंगल, नैऋत्य में राहू, पश्चिम में शनि, वायव्य में चन्द्रमा,और उत्तर में बुध का स्थान नियत किया गया है I विभिन्न वास्तु की पुस्तकों में केतु को वायव्य जबकि अन्य पुस्तकों में उसे ईशान का स्थान दिया गया है I इस सम्बन्ध में यद्यपि प्रामाणिक तौर पर तो नहीं कहा जा सकता, परन्तु व्यावहारिक रूप से ज्योतिषशास्त्र में इसे मोक्षकारक ग्रह मानने के कारण ज्ञान का कोना ईशान कोण  में इसके होने को स्वीकार किया जा सकता है I</p>
<p>वास्तुशास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिशा की दीवार को नौ बराबर भागों में विभाजित किया गया और विभिन्न देवताओं को उसका अधिपति माना गया है। इसके अलावा, चहारदीवारी और घर के  बीच की खुली जगह को पिशाचक्षेत्र माना गया I पिशाच  यानी  वे आत्माएं जो  मृत्यु के बाद  मोक्ष  प्राप्त नहीं कर सकीं I अतः कोई भी निर्माण जो चाहरदीवारी को घर के साथ जोड़े उसे  रूप-परिवर्तन वेध मानते हुए वास्तु नियमों के अनुसार निषिद्ध किया गया है क्योंकि ऐसा निर्माण पिशाचों के विचरण को बाधित करता है और जिसका दुष्परिणाम उस घर में निवास करने वालों को भोगना पड़ता है I  वास्तुशास्त्र में यह भी सुझाव दिया गया है कि घर और चहारदीवारी के बीच चारों ओर कुछ खुली जगह रखी जाय ताकि घर की  दीवारों पर सूर्य की रोशनी और हवाओं के निर्बाध प्रवाह के कारण नमी और अन्धकार से उत्पन्न दरारों की मरम्मत करवा सकें और काई और रोगाणुओं से  रक्षा हो सके।  आज के आधुनिक समय में भी यह  प्रासंगिक है और इसी कारण से हम घर की दीवारों की मरम्मत समय-समय पर करवाते रहते हैं I इस तरह  हमारे ऋषि मुनियों ने अपने सर्वोत्तम विवेक से हमारे घर में ही नवग्रह, पञ्च-तत्व, देवगण, पिशाच और मनुष्य के लिए उचित स्थानों को चिन्हित कर दिया था  I</p>
<p>विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं की गति और दिशा के सम्बन्ध में भी वास्तुशास्त्र में वर्णन किया गया है, जिसमे पृथ्वी की घूर्णन गति, परिक्रमा,चुम्बकीय प्रभाव आदि के आधार पर घर में इन ऊर्जाओं का प्रवाह अंग्रेजी अक्षर <strong>s</strong> के  आकार में दर्शाया गया है और इनसे मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर उनको वर्गीकृत भी किया गया है I यह ऊर्जा उत्तर-पूर्व से प्रवेश करती है, उसके बाद उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर जाती है और अंत में दक्षिण-पश्चिम कोने से बाहर निकल जाती है।  एक अन्य महत्वपूर्ण विन्दु यह है कि ऊर्जा का प्रवेश जमीन के  सबसे निचले स्तर से होते हुए उत्तरोत्तर उर्ध्वगति से अंग्रेजी के एस अक्षर की तरह दक्षिणी-पश्चिमी दिशा तक होता है I  इसी कारण से वास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व की दीवार की ऊंचाई को सबसे कम और दक्षिण-पश्चिम की दीवार को सबसे ऊंची रखने के सलाह दी जाती है। यह केवल घर में उन लाभकारी ऊर्जा को बनाए रखने के उद्देश्य के लिए किया गया है ।</p>
<p>यह ध्यान रखना और भी दिलचस्प है कि घर, फ्लैट, कारखाने या कार्यालय में हुए ऐसे किसी भी परिवर्तन के कारण होने वाले प्रभावों के दिखने की भी ख़ास समयसीमा है । यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि उत्तर-पूर्व कोने में ऐसा  परिवर्तन लगभग एक दिन में असर दिखाता है, वहीँ उत्तर-पश्चिम कोने में किसी भी तरह के बदलाव से असर आने में ३५ से ४५ दिन तक लग जाते हैं।  दक्षिण-पूर्व कोने में ऐसा परिवर्तन लगभग छह महीने से एक वर्ष  और  दक्षिण-पश्चिम कोने में किसी भी बदलाव का असर मिलने में एक वर्ष से अधिक समय लग सकता है। इसका लाभ या हानि इस बात पर निर्भर करता है कि इस तरह के बदलाव वास्तु नियमों के अनुसार किये गए हैं या नहीं। सभी दिशाओं और कोनों में संरचनात्मक बदलाव के प्रभाव हमारे स्वास्थ्य, धन और खुशी पर प्रत्यक्ष रूप में दिखते हैं I हमें उत्तर-पूर्व  कोने में कोई भी बदलाव करते समय अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए, बल्कि यह सलाह दी जाती है कि किसी भी वास्तु-विशेषज्ञ की देखरेख में  ही ऐसा बदलाव किया जाय ।  इसका मुख्य कारण  है कि इसका तत्काल प्रभाव होता है I अन्य स्थानों में हुए बदलाव का असर देर से होने के कारण किसी भी प्रतिकूल प्रभाव दिखने की दशा में उनका त्वरित निराकरण किया जा सकता है । यद्यपि किसी एक वास्तु दोष का सम्बन्ध मुख्य रूप से किसी एक कष्ट से ही होता है परन्तु अन्य दोषों का भी मिला जुला प्रभाव अवश्य होता है I अतः सुयोग्य वास्तुशास्त्री के द्वारा वास्तु सुधार करते समय सभी दिशाओं और उपदिशाओं के दोषों को भी देखा जाना बहुत ही  आवश्यक होता है I</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>जिओपैथिक स्ट्रेस और वास्तु-दोष</title>
		<link>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%93%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d/</link>
					<comments>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%93%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deepak]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jan 2018 10:09:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी खण्ड]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.joyvastu.com/?p=554</guid>

					<description><![CDATA[क्या हमने कभी ध्यान दिया है कि किसी नए घर में जाने पर हमारे प्रतिदिन के कामों में बार-बार व्यवधान क्यों आते हैं; क्यों घर के सदस्यों की तबीयत अचानक खराब होने लगती है; रातों में नींद नहीं आती और सुबह होने पर मन थकान और आलस्य से बोझिल रहता है, जबकि घर से बाहर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-549" src="http://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/01/geopathic-stress.jpg" alt="" width="236" height="166" /></p>
<p>क्या हमने कभी ध्यान दिया है कि किसी नए घर में जाने पर हमारे प्रतिदिन के कामों में बार-बार व्यवधान क्यों आते हैं; क्यों घर के सदस्यों की तबीयत अचानक खराब होने लगती है; रातों में नींद नहीं आती और सुबह होने पर मन थकान और आलस्य से बोझिल रहता है, जबकि घर से बाहर निकलने पर अच्छी और सुखद अनुभूति होती है; साधारण बीमारियाँ भी सामान्य इलाज से ठीक नहीं होती हैं; बगीचे में लगी झाड़ियाँ बीच-बीच से खाली हो जाती हैं ; घर में एक के बाद एक दुखद घटनाएं घटती रहती हैं ; घर का कोई सदस्य शारीरिक अथवा मानसिक रूप से विकलांग हो जाता है ; यहाँ तक कि घर के किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु भी हो जाती है ;ऐसी अनेक दुखद स्थितियां हमारे सामने आती हैं जिनका कोई स्पष्ट कारण नहीं दीखता और हम विधि का विधान मानकर भोगते रहते हैं I</p>
<p>भारतीय ऋषि-मुनियों द्वारा रचित चारों वेदों में एक अथर्व वेद ही ऐसा वेद है जिसमे इन सभी प्रश्नों के शास्त्रोक्त उत्तर मिलते हैं I इन प्रश्नों के कारण और निवारण से सम्बंधित सूक्ष्म विधान दिए गए हैं .भवन निर्माण का मुख्य उद्देश्य, मनुष्य के लिए ऐसे भवन का निर्माण करना है, जिसमे मनुष्य आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति करते हुए सुख ,शान्ति और समृद्धि को प्राप्त करे Iअथर्ववेद में भवन निर्माण के क्रम में निर्माण के विभिन्न चरणों में ली जाने वाली सावधानियों का विस्तृत वर्णन मिलता है I इसके अनुसार भवन निर्माण के पहले, भूमि और उसकी मिट्टी के गुण-दोषों का भी उल्लेख है और विभिन्न प्रकार के दोष जैसे शल्य दोष,प्लव दोष (Slope defect), कोण दोष, आकार दोष आदि का विशेष वर्णन किया गया है I  भवन निर्माण के पहले उन दोषों की  जानकारी और उनका निवारण वास्तु-सम्मत भवन निर्माण की महत्वपूर्ण शर्तें हैं. इन्ही दोषों में एक महत्वपूर्ण दोष शल्य-दोष है I भूमि के अन्दर पाए जाने वाले शल्यों के आधार पर उस भवन में निवास करने वाले व्यक्तिओं पर अशुभ शारीरिक और मानसिक प्रभाव पड़ता है I शल्य युक्त भूमि पर भवन निर्माण करने से उसमे रहने वालों को अनेक प्रकार के अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं, ऐसे अशुभ प्रभाव राज भय, रोग,क्लेश,संतान का नाश आदि किसी भी प्रकार के हो सकते हैं I शास्त्रों में शल्यों की प्रकृति के आधार पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन किया गया है I</p>
<p>परन्तु आज के युग में बिना प्रायोगिक विश्लेषण के किसी भी बात को तबतक स्वीकार नहीं किया जाता जबतक उनका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिल जाए I इस सम्बन्ध में यह जानना बहुत रोचक है कि प्राचीन वास्तु शास्त्र में जिस शल्य दोष का वर्णन किया गया है, उसको एक अलग विधि से प्रायोगिक परीक्षण द्वारा बीसवीं सदी के मध्य में सन 1952 को जर्मन भौतिकविद शूमेन के द्वारा शूमेन रेजोनेंस के रूप में दर्शाया गया, जिसमे उन्होंने बताया कि पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाली ऊर्ध्वमुखी विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों की कम्पन आवृति 7.83 हर्ट्ज़ है और इन तरंगों की कम्पन आवृति  मनुष्य के मस्तिष्क के उस अल्फा क्षेत्र के समतुल्य है जिसमे मनुष्य शांत-चित्त, प्रसन्न और स्वस्थ रहता है I इसी प्राकृतिक कम्पन आवृति को शूमेन रेजोनेंस का नाम दिया गया I इन स्थानों पर ऑक्सीजन और नेगेटिव आयन्स की  बहुलता पायी गयी, जो स्वस्थ जीवन के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं Iपरन्तु भूगर्भ केंद्र से पृथ्वी की सतह तक आने के क्रम में यदि बीच में उन विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों को किसी प्रकार के घनत्व-परिवर्तन का सामना करना पड़ता है तो उन तरंगों की आवृत्तियों में परिवर्तन होता है, जिससे जिओपैथिक स्ट्रेस जोन का निर्माण होता है और इस क्षेत्र में विद्युत् चुम्बकीय तरंगों की आवृति शूमेन रेजोनंस से कई गुना अधिक होती है I यह परिवर्तन किसी भी कारण से हो सकता है जैसे, भूगर्भीय जल-स्रोत, खनिज् भण्डारण अथवा भूगर्भीय चट्टानी परतें I परन्तु  प्राकृतिक कारणों के अतिरिक्त मानव जनित कारण भी जिओपैथिक स्ट्रेस जोन का निर्माण करते हैं जैसे, अंडरग्राउंड केबलिंग,वाटर पाइपलाइंस, सीवर्स अथवा अंडरग्राउंड टनेल्स और रेलवेज I इन अवरोधों के कारण तरंगों की कम्पन आवृति में हुए परिवर्तन से ही जिओपैथिक स्ट्रेस का निर्माण होता है, जो धरती की सतह तक आते आते 7.83 हर्ट्ज़ से काफी अधिक हो जाता है, परिणामस्वरुप मानव मष्तिष्क प्राकृतिक कम्पन आवृति से अधिक आवृति की स्थिति में आने पर असहजता महसूस करता है. यदि काफी समय तक उच्च तीव्रता वाले माहौल में अर्थात असहज स्थिति में किसी को रहना पड़े तो उस तनाव के कारण धीरे-धीरे उसकी कार्य करने की क्षमता में ह्रास होने लगता है और व्यक्ति की रोगों से लड़ने की शक्ति कम होती चली जाती है I इसका असर ये होता है कि धीरे-धीरे व्यक्ति विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाता है I अन्य प्रयोगों के क्रम में जिओपैथिक स्ट्रेस जोन के प्रभाव को दिखाने के लिए हार्टमन ग्रिड और कर्री लाइन्स की भी खोज हुयी . एक से सोलह तक के वर्गीकरण में  एक ओर जहाँ एक अंक शूमान रेजोनेंस के लिए माना गया वहीँ सोलह अंक उच्चतम तीव्रता के कम्पन अर्थात् सर्वाधिक जिओपैथिक स्ट्रेस क्षेत्र के लिए निर्धारित किया गया. विभिन्न प्रयोगो के आधार पर पाया गया कि किसी भवन में बहुतायत से पाए जाने वाली जिओपैथिक स्ट्रेस लाइंस का दीर्घकालीन प्रभाव कैंसर , लकवा ,ह्रदय रोग जैसे असाध्य रोगों का भी कारण है I यहाँ तक कि किसी स्थान पर लगातार होने वाली सड़क दुर्घटनाएं भी अत्यधिक जिओपैथिक स्ट्रेस जोन की उपस्थिति की ओर इशारा करती हैं I</p>
<p><strong>जिओपैथिक स्ट्रेस</strong> <strong>जोन</strong> <strong>एवं शल्य दोषों की पहचान &#8211;         </strong>जिओपैथिक तनाव युक्त भूमि अथवा भवन के जिओपैथिक स्ट्रेस या शल्य दोषों की पहचान एक संवेदनशील व्यक्ति उन स्थानों में समय बिताने पर अपने अन्दर होने वाली शारीरिक या मानसिक अनुभूतियों के आधार पर ही कर लेते हैं और ऐसे स्थान पर थोड़ी देर ही रहने से उनके अन्दर मानसिक रूप से असहजता और व्याकुलता होने लगती है I यदि रात में उस स्थान पर सोने की नौबत आ जाय तो अनिद्रा या नींद में व्यवधान के साथ-साथ सुबह में थकान, आलस्य और बोझिलपन जैसे अनुभव भी महसूस होते हैं I भूगर्भ से निकली विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों के प्रवाह में हुए व्यवधान के कारंण उच्च आवृति की तरंगें भूमि अथवा भवन में क्रियाशील होती हैं, उस तीव्रता के कारण उत्पन्न जिओपैथिक स्ट्रेस लाइंस की पहचान उस स्थान की दीवारों में आई दरारें और दीवारों के उखड़े प्लास्टर वाले स्थान से भी की जा सकती है I यहाँ तक कि अधिक नमी वाले स्थानों में लगने वाली काई भी जिओपैथिक स्ट्रेस जोन को दर्शाती हैं. विदेशों में इसको पहचानने के लिए डाउजिंग-पद्धति  का उपयोग किया जाता है.प्राचीन रोमन सभ्यता में भी इसको पहचानने के लिए भेड़ों को काफी समय तक उस क्षेत्र में रहने के लिए छोड़ दिया जाता था और बाद में उन भेड़ों के अंगों के सूक्ष्म निरीक्षण से उस स्थान के जिओपैथिक स्ट्रेस जनित प्रभाव की जांच की जाती थी I</p>
<p>एक बहुत महत्वपूर्ण संकेत उस परिसर में पाए जाने वाले पशुओं और कीट पतंगों आदि से  भी लगाया जा सकता है I एक ओर जहाँ गाय,घोड़े और कुत्ते जिओपैथिक स्ट्रेस जोन से दूर रहना चाहते हैं वहीँ दूसरी ओर चींटी, बिल्ली, दीमक,मधुमक्खी ,सांप, मकड़े आदि उच्च तीव्रता वाले कम्पन आवृतियों के क्षेत्र में ही पलते-बढ़ते हैं I सामान्यतः पालतू बिल्लियाँ घर के उसी स्थान पर आराम करना पसंद करती हैं जहाँ पर जिओपैथिक स्ट्रेस का प्रभाव हो, वहां की जमीनी सतह का तापमान अन्य जगहों की तुलना में ज्यादा होता है I व्यावहारिक रूप से भी किसी घर में दीमक का ट्रीटमेंट कराने के बाद स्पष्ट रूप से एक शान्ति का अनुभव होता है. ऐसा ट्रीटमेंट पृथ्वी के अन्दर से आने वाली विद्युत्-चुम्बकीय आवृति के प्रवाह को बाधित कर देता है I जिन स्थानों पर ये पशु पक्षी अथवा कीट- पतंगे पाए जाते हैं, वे स्थान जिओपैथिक तनाव से प्रभावित स्थान होते हैं और इसी कारण प्रायः सभी वास्तु-शास्त्री इन दोषों के अविलम्ब निराकरण का सुझाव देते हैं I  जिस प्रकार भूगर्भ में पायी जाने वाली अंडरग्राउंड वाटर स्ट्रीम्स,खनिज भण्डार की उपस्थिति अथवा भूगर्भीय चट्टानों की परतें, पृथ्वी के केंद्र से आने वाली विद्युत्-चुम्बकीय  तरंगों की आवृति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं, उसी प्रकार किसी भूखंड की सीमा में पायी जाने वाली शल्यकारक वस्तुएं भी उस स्थान पर निवास करने वालों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं I प्राचीन वास्तु शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार इसका सीधा प्रभाव परिवार के सम्बंधित सदस्यों के स्वास्थ्य की हानि के रूप में दिख जाता हैं I भवन निर्माण हेतु चयन की गयी भूमि के अन्दर पाए जाने वाले शल्य का प्रभाव एक सीमित स्थान तक परन्तु काफी तीव्र होता है I टोना टोटका करने वाले या काला जादू करने वाले इसी माध्यम का दुरुपयोग करते हैं I  ऐसे शल्य की उपस्थिति मात्र से ही उस भवन में निवास करने वालों को अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है I लेकिन सामान्यतः कोई व्यक्ति अपने घर का कूड़ा-कचरा या अपने घर के अवशिष्ट पदार्थों को अपने बगल की खाली जमीन पर फेंक दे या किसी खाली स्थान पर जब किसी मरे हुए जानवर के शव को डाल दिया जाय और कुछ समय के बाद जब कोई व्यक्ति उसी खाली जमीन को बिना अच्छी साफ़-सफाई के अथवा बिना शल्य निष्कासन किये बाहरी मिट्टी से अथवा किसी और मकान के मलवे से भर के उसपर भवन निर्माण कर लेता है तब जो दोष उत्पन्न होता है उससे ही शल्य दोष होता है और इसी से जिओपैथिक स्ट्रेस क्षेत्र का निर्माण होता है I  इसका प्रतिकूल प्रभाव वहां रहने वाले को भोगना पड़ता है I यदि शल्य के रूप में हड्डी दबी हो तो हड्डी मिलने की दिशा के अनुसार उस भवन में रहने वालों को उसके दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं I उसी प्रकार लकड़ी, बाल, कोयला, जानवर के अंग, लोहा आदि जिस भूमि के अन्दर शल्य के रूप में हों, वहां निवास करने वालों को उसके अनुरूप दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं I इसीलिए जब भी किसी भूमि पर भवन-निर्माण किया जाय तो निश्चित रूप से किसी योग्य वास्तुविद की सलाह के अनुसार उस भूमि का शल्य उपचार करा लेना आवश्यक होता है I</p>
<p><strong>जिओमैन्सी(Geo</strong><strong>pathic Stress Clearance</strong><strong>) या शल्यदोष निवारण ­-  </strong>प्राचीन वास्तु शास्त्र में शल्य दोषों के निवारण की अनेक विधियाँ बताई गयी हैं I विदेशों में भी जिओपैथिक स्ट्रेस क्लीयरेन्स के कई उपाय प्रचलन में हैं . प्रभावी रूप से शल्य दोष निवारण भवन निर्माण के लिए चुनी गयी भूमि की सीमा के अन्दर किसी स्थान की मिट्टी को गृहस्वामी की ऊंचाई के बराबर काट के बाहर निकाल कर और फिर उस स्थान को बाहर से लायी गयी मिट्टी से भर के किया जा सकता है I इसके अलावे भूखंड का पञ्च-गव्य उपचार भी एक बहुत ही सशक्त उपाय है I भवन निर्माण के पूर्व उस भूमि पर दुधारू गाय बछड़े सहित कम से कम तीन दिनों तक सभी व्यवस्था सहित रहने के लिए छोड़ देने से भी दोषयुक्त भूमि का शल्य दोष दूर हो जाता है I जहाँ एक ओर विदेशों में और मुख्य रूप से चाइनीज फेंग शुई में इन जिओपैथिक स्ट्रेस जनित दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए क्रिस्टल के उपयोग ,ताम्बे के रॉड , पाकुआ मिरर, पिरामिडों आदि का प्रयोग किया जाता है, वहीँ हमारे प्राचीन वास्तु-शास्त्र में इन दोषों का निराकरण मृदाशोधन के रूप में दर्शाया गया है I अन्य तरीकों में कुछ आध्यात्मिक उपाय भी हैं जैसे रेकी, प्राणिक हीलिंग और दूरस्थ मृदा शोधन ( Remote Geopathic Stress Clearance)   अनेक वास्तु परीक्षण के अनुभवों के आधार पर लेखक ने स्वंय भी कई स्थानों में  शल्य-दोष जनित तनाव अथवा जिओपैथिक स्ट्रेस का अनुभव किया है और उनके सम्यक निवारण के बाद हुए शारीरिक और मानसिक बदलाव को भी महसूस किया है i यदि आप में से किसी ने भी ऐसी किसी समस्या का सामना किया हो तो निश्चित रूप से एक बार शल्य-दोष निवारण अथवा जिओपैथिक स्ट्रेस क्लीयरेन्स के सम्बन्ध में किसी भी स्थानीय और सुयोग्य वास्तुविद से विमर्श कर लें और इसका स्थायी निदान करवा लें I</p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.joyvastu.com/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%93%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>4</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>Vaastu Tips</title>
		<link>https://www.joyvastu.com/vaastu-tips/</link>
					<comments>https://www.joyvastu.com/vaastu-tips/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deepak]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Jan 2018 06:33:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Vaastu Tips in English]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.joyvastu.com/demo/?p=92</guid>

					<description><![CDATA[Our Vaastu (Home) is like a castle which not only protects us from thefts and robberies but also protects us from ill reputes, litigations, diseases and sorrow etc. SWAASTIK and OM are auspicious symbols having very high bio-cosmic energy levels. So we should take utmost precautions while using them in the house. Although a complete [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-295" src="http://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/01/vastu-chart.jpg" alt="" width="630" height="640" srcset="https://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/01/vastu-chart.jpg 630w, https://www.joyvastu.com/wp-content/uploads/2018/01/vastu-chart-345x350.jpg 345w" sizes="auto, (max-width: 630px) 100vw, 630px" /></p>
<ul>
<li>Our Vaastu (Home) is like a castle which not only protects us from thefts and robberies but also protects us from ill reputes, litigations, diseases and sorrow etc.</li>
<li>SWAASTIK and OM are auspicious symbols having very high bio-cosmic energy levels. So we should take utmost precautions while using them in the house. Although a complete SWASTIKA or OM properly sketched anywhere is sufficient to ward off evil effects of Vaastu defects; however it should not be used at dirty places. It should <strong>neither</strong> be written on the floor at the entry point of the house <strong>nor</strong> on the walls of kitchen or toilet.</li>
<li>Creaking doors in the house create multiple problems. Fear of unknown and domestic quarrels are few effects. Always keep the doors in good conditions by way of lubricating the joints at regular intervals..</li>
<li>Leaking water taps in South, South-West and West cause excessive expenditures on health related problems. They should be repaired immediately.</li>
<li>Defective electronic gadgets, stopped wall clock and weak battery in the vehicle cause problems related to servants and maids.</li>
<li>Dark colored and heavy curtains are good for South and West directions whereas light colored curtains are preferable in North and East directions.</li>
<li>If the entry of the positive energy from North-East corner is obstructed due to electric pole, tree, or apartment, it will adversely affect the career prospects of the owner. A high powered bulb or any light facing the house from North-East direction will significantly reduce the ill effects.</li>
<li>Permanent light in North-East corner inside and outside the house keeps the house always energized with divine blessings. Similarly a bulb throwing bright light away from the house in South-West corner will weaken Rahu effects of the house.</li>
<li>Presence of termites, reptiles, red ants, cobwebs etc. in the house signifies the presence of Geopathic stress zone which should be cleared with the use of Geopathic stress clearance devices such as pyramids, crystals, copper wires as well as remote Geopathic stress removal techniques etc.</li>
<li>Mobile phones, Television, electric holders without bulb and all other functional electronic equipments in the house generate a cobweb of electromagnetic radiations in the room thereby creating <strong>electro smog</strong>. It emits positive ions and disturbs Alpha region of the brain causing uneasiness and restlessness while sleeping. So it is always advisable to turn all these equipments off before sleeping.</li>
<li>Permanent structures in South-West representing Rahu such as Stairs and toilets according to Vaastu principles are good and beneficial whereas external symbols of Rahu such as termites, snakes, cobwebs, scorpions, bees in the house are equally harmful and inauspicious.</li>
<li>Repairs and white washing of the house should be done at regular intervals so as to eliminate any such Vaastu defect created due to wear and tear effects.</li>
<li>It’s not advisable to put the pictures of Gods and Goddesses on the walls in each room as it is against Symbolic Vaastu shastra. Even pictures of God symbolize Jupiter and it has the same effect as that of a real Puja room. Therefore, depending upon the location of those pictures in a house, the respective effects of Puja room will be witnessed by the occupants. At best these can be put in North, East and North-East of the entire house which is in any way beneficial as per Vaastu principles.</li>
<li>Posters and pictures depicting violence, hatred, sorrow or mysteries bring similar emotions in the family, so it is advisable to avoid such posters in the house. Pictures of joyful activities, cheerfulness, and inspirational quotes are always good in the house. They invite positive energies into the house.</li>
<li>Cracks in the outer walls of the house or cracks in the walls inside the house have serious effects on the health of the family members depending upon the location of those cracks.</li>
<li>Fused bulbs and tube lights outside or inside the house are also capable to invite inauspicious results. Generally it so happens that people replace a fused bulb with a bulb already fitted at any other place of the house. It simply creates another defect corresponding to that particular place. So it is always advisable to replace fused bulb with a new one.</li>
<li>Even the corrosion of plaster from the walls or dampness in the walls is also a serious defect in Vaastu terms. It’s incidence in different directions has corresponding effects on health and prosperity.</li>
<li>Home (Vaastu) is like a concave mirror in real life. You get the magnified images of the objects which you place before it;</li>
<li>It is not just a concrete structure rather it is a living organism;</li>
<li>You should be and remain thankful to your home for providing you shelter;</li>
</ul>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.joyvastu.com/vaastu-tips/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>3</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
