वास्तुशास्त्र की प्रासंगिकता

जहां हम रहते हैं  उस स्थान को वास कहा जाता है  जो  संस्कृत भाषा की  क्रिया वस्  से लिया गया है। इस  प्रकार वास स्थान  के अध्ययन को ही वास्तुशास्त्र कहा जाता है।  हमारे निवास  को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक ऊर्जाओं  में भौगोलिक ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा , चंद्र ऊर्जा और विभिन्न ब्रह्मांडीय ऊर्जा हैं जो खगोल में स्थित ग्रहों एवं तारों से प्राप्त होती हैं। वस्तुतः वास्तुशास्त्र का मुख्य उद्देश्य इन ऊर्जाओं के सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाने और उनके नकारात्मक  प्रभावों  को कम करने से सम्बन्धित है । मेरे वास्तु विजिट्स के दौरान  अक्सर मुझसे यह प्रश्न किया जाता है कि वास्तुशास्त्र वैज्ञानिक शास्त्र  है या नहीं ?  वस्तुतः मेरे दृष्टिकोण से  वास्तव में यह जीवन जीने की विधि है जो हमें ये बताती है कि कैसे  ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ तारतम्यता स्थापित करके  रहा जा सकता है ।  हमारे प्राचीन वैदिक पुस्तक अथर्ववेद के उप वेद स्थापत्य वेड  में इन्ही तथ्यों का सम्यक विश्लेषण किया गया है कि   ब्रह्माण्ड से प्राप्त  ऊर्जाओं के अच्छे प्रभाव को तालमेल के माध्यम से कैसे बढ़ाया जा सकता है I हमारे प्राचीन वैदिक ग्रंथों के स्थापित सिद्धांतों पर हमारे घरों का निर्माण और डिजाइन करने की प्रासंगिकता ही इस आलेख की विषयवस्तु है  ।

वास्तुशास्त्र हमें न केवल  वास्तुसम्मत विधियों के आधार पर खुशहाल जीवन जीने के लिए घर के निर्माण और डिजाइन से सम्बंधित विस्तृत और जटिल दिशा निर्देश बताता है बल्कि  हमें यह भी  बताता है कि अच्छी नींद के लिए बिस्तर पर सोने का तरीका क्या हो ; पूजा कैसे की जाय कि अधिकतम दिव्य आशीर्वाद प्राप्त हो सके ; कैसे अपने पड़ोसी और रिश्तेदारों के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाया जा सके ; बेहतर प्रदर्शन के लिए कार्यालय में कैसे बैठा जाय;  कैसे हमारे अधीनस्थ और सहयोगी कार्यालय में हमें सम्मान दें; कैसे रोग और घरेलू कलह को समाप्त किया जाय और कैसे स्वास्थ्य, धन और खुशी प्राप्त करते हुए  घर के आभामंडल  को मजबूत किया जाय ?

क्या आपने कभी गौर किया है कि ,

घर  में बंद दीवार घडी आपके घर के नौकरों और नौकरानियों से संबंधित समस्याओं को जन्म देती है ?

खिड़की के टूटे कांच दुर्भाग्य और रोग के सूचक हैं ?

दरवाजे के कब्जों  की आवाजें वैवाहिक संबंधों में दरार पैदा कर सकती हैं ?

घर के पूर्वोत्तर कोने में रखे झाड़ू या कचरा घरेलू झगड़े के लिए जिम्मेदार है ?

घर की दीवारों की दरारें सदस्यों की बीमारियों का कारण  हैं ?

किसी भी वास्तु शास्त्री के लिए ये कुछ महत्वपूर्ण संकेत हैं, जिनके माध्यम से उन्हें उस घर की परेशानियों  का अंदाज हो जाता है।  घर, ऑफिस,फैक्टरी या अन्य स्थानों से सम्बंधित विभिन्न समस्याओं का निदान करने के लिए इन्हें समान रूप से प्रासंगिक माना गया है।  वास्तुशास्त्र की अवधारणा  जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और आकाश तत्वों से प्राप्त होने वाली ऊर्जाओं और उनके प्रभावों के सूक्ष्म अध्ययन से सम्बंधित है I इसमें दिशाओं और उपदिशाओं को पांच तत्वों और उनके पारस्परिक संबंधों के आधार पर विश्लेषित किया गया है I ये दिशाएँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण हैं, जबकि उपदिशायें उत्तर-पूर्व (ईशान),, उत्तर-पश्चिम(वायव्य), दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), दक्षिण- पूर्व (आग्नेय) और केंद्र (ब्रह्मस्थान) हैं I इन तत्वों के पारस्परिक सम्बन्ध से उत्पन्न प्रभावों और उनके निदान के लिए ही आज के आधुनिक युग में भी वास्तुशास्त्र की प्रासंगिकता  बनी  हुयी  है I

घर को प्राचीन वैदिक काल से  ही चेतन माना गया है। यही कारण है कि हम अपने सभी धार्मिक गतिविधियों में वास्तु देवता को अनिवार्यता के साथ स्थान देते हैं और उनकी पूजा करते हैं । यह हमारे वैदिक अनुष्ठानों में , ईंट, सीमेंट, स्टील, बालू आदि से निर्मित ढ़ांचा मात्र नहीं , बल्कि एक जीवंत इकाई के रूप में देखा जाता है I इसी कारण से पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वास्तु पुरुष  के पैर( खंभे) सीधे खड़े और आगे बढ़ने के लिए,आँखें (खिड़कियाँ) बाहर की दुनिया को देखने के लिए, नाक (वेंटिलेटर) साँस लेने के लिए और मस्तिष्क (उत्तर-पूर्व का खुलापन)  सोचने और अपनी रचनात्मकता व्यक्त  करने आदि के रूप में माना गया है और यही कारण है कि वास्तु नियमों के अनुसार घर में खंभे और खिड़कियां युग्म संख्या में होनी चाहिए (जोड़ी का प्रतीक ) ; यही कारण है कि दीवारों पर बिना आवश्यकता के कांटी नहीं होनी चाहिए जो वास्तुपुरुष के शरीर  में चुभन और  दर्द पहुंचाते हैं और जिनका प्रभाव घर में रहने वालों को भी भोगना पड़ता है; जंग और दीवारों की दरारें वास्तुपुरुष के घाव की तरह मानी जाती हैं जो धीरे-धीरे परिवार के सदस्यों के रोग का कारण बनती हैं ।

वैदिक साहित्य में संभवतः मानवीकरण की ऐसी व्यवस्था धर्म प्रधान हिन्दू समाज में अधिक स्वीकार्यता दिलाने के लिए की गयी थी और विभिन्न देवताओं के निवास के साथ इसे  जोड़ दिया गया; जैसे पूर्वोत्तर में भगवान शिव का स्थान है , दक्षिण में यम देवता अर्थात् मृत्यु देवता का वास है; पूर्व दिशा  भगवान सूर्य के लिए और पश्चिम दिशा में वरुण देव का स्वामित्व माना गया आदि I

इसी प्रकार से सौरमंडल के नवग्रहों का स्थान भी वास्तुशास्त्र में सभी दिशाओं और उपदिशाओं पर निर्धारित किया गया है I ईशान कोण में देवगुरु बृहस्पति, पूर्व में सूर्य,आग्नेय में शुक्र, दक्षिण में मंगल, नैऋत्य में राहू, पश्चिम में शनि, वायव्य में चन्द्रमा,और उत्तर में बुध का स्थान नियत किया गया है I विभिन्न वास्तु की पुस्तकों में केतु को वायव्य जबकि अन्य पुस्तकों में उसे ईशान का स्थान दिया गया है I इस सम्बन्ध में यद्यपि प्रामाणिक तौर पर तो नहीं कहा जा सकता, परन्तु व्यावहारिक रूप से ज्योतिषशास्त्र में इसे मोक्षकारक ग्रह मानने के कारण ज्ञान का कोना ईशान कोण  में इसके होने को स्वीकार किया जा सकता है I

वास्तुशास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिशा की दीवार को नौ बराबर भागों में विभाजित किया गया और विभिन्न देवताओं को उसका अधिपति माना गया है। इसके अलावा, चहारदीवारी और घर के  बीच की खुली जगह को पिशाचक्षेत्र माना गया I पिशाच  यानी  वे आत्माएं जो  मृत्यु के बाद  मोक्ष  प्राप्त नहीं कर सकीं I अतः कोई भी निर्माण जो चाहरदीवारी को घर के साथ जोड़े उसे  रूप-परिवर्तन वेध मानते हुए वास्तु नियमों के अनुसार निषिद्ध किया गया है क्योंकि ऐसा निर्माण पिशाचों के विचरण को बाधित करता है और जिसका दुष्परिणाम उस घर में निवास करने वालों को भोगना पड़ता है I  वास्तुशास्त्र में यह भी सुझाव दिया गया है कि घर और चहारदीवारी के बीच चारों ओर कुछ खुली जगह रखी जाय ताकि घर की  दीवारों पर सूर्य की रोशनी और हवाओं के निर्बाध प्रवाह के कारण नमी और अन्धकार से उत्पन्न दरारों की मरम्मत करवा सकें और काई और रोगाणुओं से  रक्षा हो सके।  आज के आधुनिक समय में भी यह  प्रासंगिक है और इसी कारण से हम घर की दीवारों की मरम्मत समय-समय पर करवाते रहते हैं I इस तरह  हमारे ऋषि मुनियों ने अपने सर्वोत्तम विवेक से हमारे घर में ही नवग्रह, पञ्च-तत्व, देवगण, पिशाच और मनुष्य के लिए उचित स्थानों को चिन्हित कर दिया था  I

विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं की गति और दिशा के सम्बन्ध में भी वास्तुशास्त्र में वर्णन किया गया है, जिसमे पृथ्वी की घूर्णन गति, परिक्रमा,चुम्बकीय प्रभाव आदि के आधार पर घर में इन ऊर्जाओं का प्रवाह अंग्रेजी अक्षर s के  आकार में दर्शाया गया है और इनसे मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर उनको वर्गीकृत भी किया गया है I यह ऊर्जा उत्तर-पूर्व से प्रवेश करती है, उसके बाद उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर जाती है और अंत में दक्षिण-पश्चिम कोने से बाहर निकल जाती है।  एक अन्य महत्वपूर्ण विन्दु यह है कि ऊर्जा का प्रवेश जमीन के  सबसे निचले स्तर से होते हुए उत्तरोत्तर उर्ध्वगति से अंग्रेजी के एस अक्षर की तरह दक्षिणी-पश्चिमी दिशा तक होता है I  इसी कारण से वास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व की दीवार की ऊंचाई को सबसे कम और दक्षिण-पश्चिम की दीवार को सबसे ऊंची रखने के सलाह दी जाती है। यह केवल घर में उन लाभकारी ऊर्जा को बनाए रखने के उद्देश्य के लिए किया गया है ।

यह ध्यान रखना और भी दिलचस्प है कि घर, फ्लैट, कारखाने या कार्यालय में हुए ऐसे किसी भी परिवर्तन के कारण होने वाले प्रभावों के दिखने की भी ख़ास समयसीमा है । यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि उत्तर-पूर्व कोने में ऐसा  परिवर्तन लगभग एक दिन में असर दिखाता है, वहीँ उत्तर-पश्चिम कोने में किसी भी तरह के बदलाव से असर आने में ३५ से ४५ दिन तक लग जाते हैं।  दक्षिण-पूर्व कोने में ऐसा परिवर्तन लगभग छह महीने से एक वर्ष  और  दक्षिण-पश्चिम कोने में किसी भी बदलाव का असर मिलने में एक वर्ष से अधिक समय लग सकता है। इसका लाभ या हानि इस बात पर निर्भर करता है कि इस तरह के बदलाव वास्तु नियमों के अनुसार किये गए हैं या नहीं। सभी दिशाओं और कोनों में संरचनात्मक बदलाव के प्रभाव हमारे स्वास्थ्य, धन और खुशी पर प्रत्यक्ष रूप में दिखते हैं I हमें उत्तर-पूर्व  कोने में कोई भी बदलाव करते समय अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए, बल्कि यह सलाह दी जाती है कि किसी भी वास्तु-विशेषज्ञ की देखरेख में  ही ऐसा बदलाव किया जाय ।  इसका मुख्य कारण  है कि इसका तत्काल प्रभाव होता है I अन्य स्थानों में हुए बदलाव का असर देर से होने के कारण किसी भी प्रतिकूल प्रभाव दिखने की दशा में उनका त्वरित निराकरण किया जा सकता है । यद्यपि किसी एक वास्तु दोष का सम्बन्ध मुख्य रूप से किसी एक कष्ट से ही होता है परन्तु अन्य दोषों का भी मिला जुला प्रभाव अवश्य होता है I अतः सुयोग्य वास्तुशास्त्री के द्वारा वास्तु सुधार करते समय सभी दिशाओं और उपदिशाओं के दोषों को भी देखा जाना बहुत ही  आवश्यक होता है I

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