रोग और वास्तु-लक्षण

प्रायः हमलोग किसी रोग के होने पर उसके उपचार के  विभिन्न प्रयासों में जुट जाते हैं I इन प्रयासों के रूप में हम रोग के लक्षणों के आधार पर तुरंत डॉक्टर से मिलकर ब्लड टेस्ट और ट्रीटमेंट आदि शुरू कर देते हैं  I हमारी मानसिकता ऎसी हो गयी है कि एक बार रोग के लक्षण प्रकट होने के बाद हम उसके शीघ्र और पूर्ण निराकरण  के लिए जुट जाते हैं I रोगों की गंभीरता के आधार पर हम एलोपैथी, नेचरोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी और यहाँ तक कि तंत्र-मंत्र और पूजा विधानों का सहारा लेने से भी नहीं परहेज करते हैं I इन सभी उपायों को करने में हम कभी यह नहीं देखते कि लोग जानेंगे तो क्या कहेंगे बल्कि  हमारा पूरा ध्यान रोग-मुक्ति पर ही केन्द्रित रहता है I कई मामलों में ऐसा पाया गया है कि रोगों के इलाज़ के क्रम में दवाइयाँ भी लम्बे समय तक असरदार नहीं रहती और रोग पुनः अपने लक्षण दिखाने लगता है I ऐसे समय में ये देखना बहुत ही आवश्यक हो जाता है कि उन रोगों का कारण कहीं और भी तो नहीं है ? यह जानना जरूरी है कि खान-पान में होने वाली असावधानियाँ, व्यायाम का अभाव या समुचित दिनचर्या के पालन में शिथिलता के अतिरिक्त वास्तु-दोष भी उन रोगों के होने के अहम कारण हो सकते हैं I वास्तु-दोष किसी रोग के होने या बने रहने के लिए उसी प्रकार महत्वपूर्ण हैं जिस प्रकार से किसी बर्तन की तली में कोई छेद, जो उस बर्तन में ऊपर से डाले गए सारे पानी को अंत में खाली कर देता है I उसी तरह से जब घर में किसी को कोई रोग हो जाता है तो दवाइयां भी अस्थायी तौर पर तभी तक असर करती हैं जबतक उनका प्रभाव रहता है, घर मे पाये जाने वाले वास्तु दोषों के कारण इससे उनका स्थायी निदान नहीं हो पाता है I परन्तु यदि घर का वास्तु-उपचार भी करवा लिया जाय तो जहाँ एक ओर काफी हद तक बीमारी से बचा जा सकता है, वहीँ दूसरी ओर यदि बीमारी हो चुकी हैं तो उन बीमारियों का इलाज़ एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी अथवा कोई भी अन्य विधि से कराते रहने पर कारगर भी हो सकता है I

जिस प्रकार आधुनिक मेडिकल साइंस के मुताबिक एक साधारण बुखार या खांसी के भी कई कारण हो सकते हैं, उसी प्रकार घर के किसी सदस्य को होने वाली बीमारी भी कई वास्तु-दोषों के सम्मिलित प्रभाव से होती हैं I  किसी एक वास्तु-दोष का प्रभाव न सिर्फ रोग या बीमारी बल्कि घर में होने वाली कई अन्य समस्यायों पर भी दिखता हैं I यही कारण है कि किसी सदस्य की रोग-व्याधि के वास्तु-लक्षण उस घर को समग्रता से और अच्छी तरह से देखने पर ही पता चल सकते हैं I परन्तु उन बीमारियों को जानने के कुछ सामान्य लक्षण भी हैं जिनको समझने के लिए किसी विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं होती है I पर उसके पूर्व यदि किसी की बीमारी के बारे में समझना हो तो उस सदस्य की परिवार में स्थिति को समझना आवश्यक है जैसे, गृहस्वामी है या गृहस्वामिनी, बेटा है या बेटी, उस बीमार व्यक्ति का गृहस्वामी से क्या सम्बन्ध है आदि I ऐसा करना इसीलिए आवश्यक होता है क्योंकि जिस प्रकार ज्योतिष शास्त्र में जातक के लग्न के आधार पर उसके सभी सगे-सम्बन्धियों के बारे में मालूम किया जा सकता है, उसी प्रकार से वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार प्रत्येक दिशा और कोण घर के किसी न किसी सदस्य का प्रतिनिधित्व करते हैं I इसी आधार पर उस घर के किसी विशेष दिशा या कोण में उत्पन्न दोषों के आधार पर उस सदस्य की बीमारी का आकलन तथा उसके उपचार का प्रयास किया जा सकता है I घर एवं भूमि की दिशा एवं कोण के अनुसार वास्तु-दोषों का प्रभाव परिवार के किसी सदस्य पर दिखता है, जैसे ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में उत्पन्न हुए वास्तु-दोष का प्रभाव उस घर के प्रथम पुत्र संतान एवं गृहस्वामी पर पड़ता है I यद्यपि गृहस्वामी के स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) से है, तथापि सामान्यतः सभी प्रकार की शारीरिक समस्यायों के मूल में ईशान कोण के दोषों का प्रभाव अवश्य देखा गया है I

प्रायः लोगों में ऐसी भ्रान्ति होती है कि वास्तु-सम्मत गृह-निर्माण करवाने के बावजूद उसमे रहने पर विभिन्न प्रकार के शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ा या वास्तु-सम्मत घर में रहने पर भी कई तरह के रोग हो गये I इससे उनका वास्तु-शास्त्र पर से विश्वास कम हो जाता है I परन्तु यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि ऐसा प्रभाव या तो आधे-अधूरे वास्तु नियमों का पालन करने के कारण होता है या ऐसा प्रभाव काफी लम्बे समय तक किसी घर में रहने के कारण उस घर की दीवारों में होने वाली टूट-फूट और उसकी तुरंत मरम्मत नहीं करवा पाने के कारण उत्पन्न वास्तु-दोषों के कारण भी हो सकता है I

इसीलिए कुछ मुख्य वास्तु-दोष जिनके आधार पर रोगों के बारे में पता चल सकता है, उन्हें दिशाओं एवं कोणों के दोषों के रूप में समझना आवश्यक है, ताकि वास्तु-सम्मत घर में रहने के बावजूद समय-समय पर आवश्यकतानुसार उनकी मरम्मत करायी जा सके I

ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)

घर के प्रथम पुत्र संतान पर ईशान कोण का बहुत ज्यादा प्रभाव देखा गया है I इस उपदिशा में होने वाले किसी दोष का अन्य प्रभावों के अलावे प्रथम पुत्र संतान के खराब स्वास्थ्य का कारक भी होता है I इस उपदिशा  मे सीढ़ी होने से उसके शारीरिक अथवा मानसिक रूप से बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है I उत्तर-पूर्व में गन्दगी वाली चीजें अथवा निर्माण होने के कारण उधर से आने वाली ऊर्जा में किसी तरह की अशुद्धि होती है तो उसका असर पूरे परिवार के खराब स्वास्थ्य के रूप में झलकता है I उस दिशा में टॉयलेट या कबाड़ी  होने से भी स्वास्थ्य पर ख़राब   असर होता है I

आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व)

इस उपदिशा में होने वाले दोषों का सीधा असर घर की महिलाओं और दूसरी संतान पर पड़ता है I अगर ऐसे किसी सदस्य की बीमारी का कारण खोजना हो तो उस दिशा में होने वाले वास्तु-दोषों को खोजना आवश्यक हो जाता है I अगर इस दिशा में घर की छत को आगे बढ़ा के चहारदीवारी तक मिला दिया जाय तो इस रूप परिवर्तन का भयंकर दुष्परिणाम उस घर की महिला की मृत्यु तक के रूप में भी मिल सकता है I इस दिशा में यदि पानी का श्रोत सीढ़ी के नीचे हो जाय तो पेट की समस्या के साथ-साथ सर्जरी की भी संभावना हो सकती है I

नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम)

गृहस्वामी की बीमारी का कारण इस उपदिशा में पाए जाने वाले दोषों से सीधे तौर पर जुडा होता है I अगर इस दिशा में कोई दोष होता है तो उससे होने वाले बाकी प्रभावों की तुलना में शारीरिक कष्ट का असर कुछ ज्यादा ही गंभीर होता है I इस दिशा के दोष घर के सदस्यों की असामयिक मृत्यु के भी कारण हो सकते हैं I इस दिशा में यदि किचन हो तो उस घर की महिला को भी कई प्रकार के रोगों का सामना करना पड़ता है I इसलिए इस दिशा-दोष को शीघ्र ही किसी योग्य वास्तुशास्त्री के निर्देश में दूर करवा लेना चाहिए I

वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम)

इस उपदिशा के किसी भी दोष का सीधा असर घर की माता और तीसरी संतान पर होता है I इसके अलावे यदि इस दिशा की छत को आगे बढ़ा के चहारदीवारी से मिला दिया जाय तो इस रूप परिवर्तन का बहुत ही भयंकर परिणाम भोगना पड़ता है और इसके कारण गृहस्वामी की कष्टदायक मृत्यु भी हो सकती है I अगर इस दिशा में किचेन हो तो घर की महिला को हाई ब्लड-प्रेशर होने की संभावना भी रहती है I उनको पथरी (स्टोन) या गैस की परेशानी भी हो सकती है I

 वास्तु-दोषों के लक्षण

घर की दीवारों में आई दरारें उस घर के सदस्यों को होने वाली बीमारियों की ओर बहुत स्पष्ट इशारा करती हैं I अगर घर की दीवारों में किसी प्रकार की दरार उसकी दक्षिण दिशा में होती हैं तो इसका असर उस घर की महिला के ख़राब स्वास्थ्य के रूप में झलकता है I इसी तरह से अगर घर की पश्चिम की दीवार में दरारें हो जाती हैं तो इसका असर उस घर के पुरुष सदस्य के रोग के रूप में दिखता है I

ऐसा देखा गया है कि दीवारों में स्थायी नमी के कारण उनके प्लास्टर भी उखड़ने लगते हैं I सामान्यतः लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि ये गंभीर वास्तु-दोष की ओर इशारा करते हैं I इन उखड़े प्लास्टर अथवा दीवारों की पपड़ियों का सीधा असर घर के लोगों के ख़राब स्वास्थ्य के रूप में दिखता है I

घर में टूटे-फूटे शीशों का होना भी रोग को निमंत्रण देने जैसा काम है I अगर घर की खिड़कियों के शीशे फूट जाएँ तो उनको जल्दी से बनवा लेना चाहिए नहीं तो दिशा के अनुसार इन फूटे शीशों का दुष्प्रभाव घर के किसी न किसी सदस्य को भोगना पड़ता है I

इसी तरह से घर में लगी बंद घड़ी भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की ओर इशारा करती हैं I

जगह की कमी और शहरीकरण के कारण आजकल लोगों को अपार्टमेंट में रहने की बाध्यता होती जा रही है I परन्तु अपार्टमेंट में बनाये गए फ्लैट में एक तो हरेक फ्लैट में वास्तु के नियमों का पालन संभव नहीं होता और वहीँ दूसरी तरफ बिल्डर कम समय में फ्लैट को हैण्डओवर करने की जल्दबाजी में और अपनी सुविधा के अनुसार दीवार बनाने के बाद उसमे चौखट और किवाड़ लगाते हैं I दीवार के साथ ही चौखट जाम नहीं करने के कारण कुछ समय के बाद दीवारों और चौखट के बीच के स्थान में गैप हो जाता है जो एक दरार के रूप में ही दिखता है I भद्दा लगने के साथ-साथ इनका भी असर दीवार की दरारों की तरह ही होता है और इनके कारण भी घर के सदस्यों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है I

घर की दक्षिण दिशा में जल का स्थान होने के कारण भी महिलाओं की सेहत ख़राब रहती है I चाहे बोरिंग हो या चापाकल, तालाब हो या स्विमिंग पूल, यहाँ तक कि घर के उपयोग के बाद बाहर निकलने वाला पानी भी यदि दक्षिण दिशा से निकलता है तो इसका सीधा असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर ही पड़ता है I

उसी तरह अगर घर के पश्चिम दिशा में जल का स्थान हो तो इसका असर घर के पुरुषों के स्वास्थ्य पर पड़ता है I घर की सारी पूँजी मेडिकल बिल भुगतान में ही निकल जायेगी I इसीलिए जहाँ तक संभव हो जल-श्रोत को दक्षिण या पश्चिम दिशा में नहीं रखना चाहिए I जल के स्थान का मतलब जमीन पर के अंडरग्राउंड जल के स्थान से है नाकि घर की छत पर के जल के स्थान से I घर की छत पर अर्थात ओवरहेड वाटर टैंक के लिए सबसे उपयुक्त स्थान दक्षिण, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशा ही है I

रोगों के होने का एक महत्वपूर्ण कारण जो सामान्यतःलोगों की नज़रों से ओझल रहता है और वो है घर या जमीन की ढाल I ढाल अर्थात स्लोप का घर के सदस्यों के स्वास्थ्य पर बहुत ही व्यापक असर होता है I वास्तु-शास्त्र में इसे प्लवदोष के रूप में बताया गया है I जमीन की ढाल, घर के अन्दर के फ्लोर की ढाल और घर की छत की ढाल सबका महत्व और प्रभाव रोगों के कारण के रूप में दिखता है I अगर घर की, जमीन की या छत की ढाल दक्षिण की ओर होती है तो इससे भी घर की महिलाओं को किसी न किसी प्रकार की शारीरिक परेशानियों से गुजरना पड़ता है I उसी तरह से यदि जमीन की, घर के अन्दर की या छत की ढाल पश्चिम की ओर हो तो उस घर के पुरुष सदस्यों को शारीरिक परेशानियां होती रहती हैं I परन्तु यदि घर अथवा जमीन अथवा छत की ढाल दक्षिण-पश्चिम की तरफ हो तो ये विनाशकारी हो सकता है और इसका शारीरिक दुष्प्रभाव घर के सभी सदस्यों को भोगना पड़ सकता है और इसका तुरंत उपाय करना आवश्यक है I

वास्तु-शास्त्र में रंगों का भी बहुत महत्व है I रंगों के उचित प्रयोग से बहुत सारे वास्तु-दोषों का निराकरण भी संभव हो सकता है I  ज्योतिषशास्त्र में भी प्रत्येक रंग के लिए एक प्रतिनिधि ग्रह का प्रावधान किया गया है I किसी भी दिशा अथवा कोनों के कमरे को उसके प्रतिनिधि ग्रहों के मित्र रंगों के बदले शत्रु रंगों से सजाने से भी घर में रोगों का सामना करना पड़ता है I उसी तरह से जैसे किसी स्थान के वास्तु-दोष को दोष-निवारक रंगों के इस्तेमाल से दूर किया जा सकता है I इसीलिए घर को सुन्दर बनाने की बजाय घर को अच्छा बनाने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है I सुन्दर घर देखने में सबको पसंद आ सकता है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि उसमे रहने वाले भी सुखी हों, लेकिन अच्छा घर उसमे रहने वालों के लिए धन-धान्य से परिपूर्ण और सुखद होता है I यदि किसी योग्य आर्किटेक्ट के निर्देश में घर बनवाया जाय तो घर सुन्दर दिखने के साथ साथ अच्छे प्रभावों को देने वाला भी बन सकता है I

घर या भूमि के विस्तार का भी स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का कारण हो सकता है I अतः ऐसे किसी भी विस्तार के पूर्व निश्चित रूप से किसी वास्तु विशेषज्ञ से सलाह ले लेनी चाहिए अन्यथा इसके बहुत ही घातक परिणाम मिल सकते हैं I जहाँ एक ओर दक्षिण दिशा को उत्तर दिशा से आने वाली जैविक ऊर्जा का क्षय स्थान माना गया है वहीँ दूसरी ओर पश्चिम दिशा को पूर्व दिशा से आने वाली प्राणिक उर्जा का क्षय स्थान माना गया है I इसीलिए दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा का कोई भी विस्तार उस क्षरण के प्रभाव की वृद्धि करने वाला होता है I दक्षिण दिशा में घर या भूमि का विस्तार उस घर की महिलाओं के लिए अहितकर होता है और पश्चिम दिशा का ऐसा कोई विस्तार घर के पुरुष सदस्यों के लिए बुरा प्रभाव देने वाला होता है I दक्षिण-पश्चिम का कोना ऐसे किसी भी विस्तार के मामले में घर के सभी सदस्यों के लिए स्वास्थ्य सम्बन्धी अत्यंत गंभीर परिणाम दे सकता है चाहे ऐसा विस्तार दक्षिण दिशा में अथवा पश्चिम दिशा में किया गया हो I

हालाँकि रोगों के होने या उनके ठीक नहीं हो सकने के बहुत सारे कारणों की यहाँ चर्चा की गयी है, फिर भी घर के किसी सदस्य के बीमार होने की स्थिति में अन्य इलाजों के साथ-साथ किसी योग्य वास्तुविद से भी सम्पूर्ण घर का वास्तु-सुधार करवा लेना उचित है ताकि सारे उपाय सार्थक हो सकें और बीमारियों का पूर्ण और स्थायी निदान हो जाय I

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