
क्या हमने कभी ध्यान दिया है कि किसी नए घर में जाने पर हमारे प्रतिदिन के कामों में बार-बार व्यवधान क्यों आते हैं; क्यों घर के सदस्यों की तबीयत अचानक खराब होने लगती है; रातों में नींद नहीं आती और सुबह होने पर मन थकान और आलस्य से बोझिल रहता है, जबकि घर से बाहर निकलने पर अच्छी और सुखद अनुभूति होती है; साधारण बीमारियाँ भी सामान्य इलाज से ठीक नहीं होती हैं; बगीचे में लगी झाड़ियाँ बीच-बीच से खाली हो जाती हैं ; घर में एक के बाद एक दुखद घटनाएं घटती रहती हैं ; घर का कोई सदस्य शारीरिक अथवा मानसिक रूप से विकलांग हो जाता है ; यहाँ तक कि घर के किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु भी हो जाती है ;ऐसी अनेक दुखद स्थितियां हमारे सामने आती हैं जिनका कोई स्पष्ट कारण नहीं दीखता और हम विधि का विधान मानकर भोगते रहते हैं I
भारतीय ऋषि-मुनियों द्वारा रचित चारों वेदों में एक अथर्व वेद ही ऐसा वेद है जिसमे इन सभी प्रश्नों के शास्त्रोक्त उत्तर मिलते हैं I इन प्रश्नों के कारण और निवारण से सम्बंधित सूक्ष्म विधान दिए गए हैं .भवन निर्माण का मुख्य उद्देश्य, मनुष्य के लिए ऐसे भवन का निर्माण करना है, जिसमे मनुष्य आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति करते हुए सुख ,शान्ति और समृद्धि को प्राप्त करे Iअथर्ववेद में भवन निर्माण के क्रम में निर्माण के विभिन्न चरणों में ली जाने वाली सावधानियों का विस्तृत वर्णन मिलता है I इसके अनुसार भवन निर्माण के पहले, भूमि और उसकी मिट्टी के गुण-दोषों का भी उल्लेख है और विभिन्न प्रकार के दोष जैसे शल्य दोष,प्लव दोष (Slope defect), कोण दोष, आकार दोष आदि का विशेष वर्णन किया गया है I भवन निर्माण के पहले उन दोषों की जानकारी और उनका निवारण वास्तु-सम्मत भवन निर्माण की महत्वपूर्ण शर्तें हैं. इन्ही दोषों में एक महत्वपूर्ण दोष शल्य-दोष है I भूमि के अन्दर पाए जाने वाले शल्यों के आधार पर उस भवन में निवास करने वाले व्यक्तिओं पर अशुभ शारीरिक और मानसिक प्रभाव पड़ता है I शल्य युक्त भूमि पर भवन निर्माण करने से उसमे रहने वालों को अनेक प्रकार के अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं, ऐसे अशुभ प्रभाव राज भय, रोग,क्लेश,संतान का नाश आदि किसी भी प्रकार के हो सकते हैं I शास्त्रों में शल्यों की प्रकृति के आधार पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन किया गया है I
परन्तु आज के युग में बिना प्रायोगिक विश्लेषण के किसी भी बात को तबतक स्वीकार नहीं किया जाता जबतक उनका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिल जाए I इस सम्बन्ध में यह जानना बहुत रोचक है कि प्राचीन वास्तु शास्त्र में जिस शल्य दोष का वर्णन किया गया है, उसको एक अलग विधि से प्रायोगिक परीक्षण द्वारा बीसवीं सदी के मध्य में सन 1952 को जर्मन भौतिकविद शूमेन के द्वारा शूमेन रेजोनेंस के रूप में दर्शाया गया, जिसमे उन्होंने बताया कि पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाली ऊर्ध्वमुखी विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों की कम्पन आवृति 7.83 हर्ट्ज़ है और इन तरंगों की कम्पन आवृति मनुष्य के मस्तिष्क के उस अल्फा क्षेत्र के समतुल्य है जिसमे मनुष्य शांत-चित्त, प्रसन्न और स्वस्थ रहता है I इसी प्राकृतिक कम्पन आवृति को शूमेन रेजोनेंस का नाम दिया गया I इन स्थानों पर ऑक्सीजन और नेगेटिव आयन्स की बहुलता पायी गयी, जो स्वस्थ जीवन के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं Iपरन्तु भूगर्भ केंद्र से पृथ्वी की सतह तक आने के क्रम में यदि बीच में उन विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों को किसी प्रकार के घनत्व-परिवर्तन का सामना करना पड़ता है तो उन तरंगों की आवृत्तियों में परिवर्तन होता है, जिससे जिओपैथिक स्ट्रेस जोन का निर्माण होता है और इस क्षेत्र में विद्युत् चुम्बकीय तरंगों की आवृति शूमेन रेजोनंस से कई गुना अधिक होती है I यह परिवर्तन किसी भी कारण से हो सकता है जैसे, भूगर्भीय जल-स्रोत, खनिज् भण्डारण अथवा भूगर्भीय चट्टानी परतें I परन्तु प्राकृतिक कारणों के अतिरिक्त मानव जनित कारण भी जिओपैथिक स्ट्रेस जोन का निर्माण करते हैं जैसे, अंडरग्राउंड केबलिंग,वाटर पाइपलाइंस, सीवर्स अथवा अंडरग्राउंड टनेल्स और रेलवेज I इन अवरोधों के कारण तरंगों की कम्पन आवृति में हुए परिवर्तन से ही जिओपैथिक स्ट्रेस का निर्माण होता है, जो धरती की सतह तक आते आते 7.83 हर्ट्ज़ से काफी अधिक हो जाता है, परिणामस्वरुप मानव मष्तिष्क प्राकृतिक कम्पन आवृति से अधिक आवृति की स्थिति में आने पर असहजता महसूस करता है. यदि काफी समय तक उच्च तीव्रता वाले माहौल में अर्थात असहज स्थिति में किसी को रहना पड़े तो उस तनाव के कारण धीरे-धीरे उसकी कार्य करने की क्षमता में ह्रास होने लगता है और व्यक्ति की रोगों से लड़ने की शक्ति कम होती चली जाती है I इसका असर ये होता है कि धीरे-धीरे व्यक्ति विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाता है I अन्य प्रयोगों के क्रम में जिओपैथिक स्ट्रेस जोन के प्रभाव को दिखाने के लिए हार्टमन ग्रिड और कर्री लाइन्स की भी खोज हुयी . एक से सोलह तक के वर्गीकरण में एक ओर जहाँ एक अंक शूमान रेजोनेंस के लिए माना गया वहीँ सोलह अंक उच्चतम तीव्रता के कम्पन अर्थात् सर्वाधिक जिओपैथिक स्ट्रेस क्षेत्र के लिए निर्धारित किया गया. विभिन्न प्रयोगो के आधार पर पाया गया कि किसी भवन में बहुतायत से पाए जाने वाली जिओपैथिक स्ट्रेस लाइंस का दीर्घकालीन प्रभाव कैंसर , लकवा ,ह्रदय रोग जैसे असाध्य रोगों का भी कारण है I यहाँ तक कि किसी स्थान पर लगातार होने वाली सड़क दुर्घटनाएं भी अत्यधिक जिओपैथिक स्ट्रेस जोन की उपस्थिति की ओर इशारा करती हैं I
जिओपैथिक स्ट्रेस जोन एवं शल्य दोषों की पहचान – जिओपैथिक तनाव युक्त भूमि अथवा भवन के जिओपैथिक स्ट्रेस या शल्य दोषों की पहचान एक संवेदनशील व्यक्ति उन स्थानों में समय बिताने पर अपने अन्दर होने वाली शारीरिक या मानसिक अनुभूतियों के आधार पर ही कर लेते हैं और ऐसे स्थान पर थोड़ी देर ही रहने से उनके अन्दर मानसिक रूप से असहजता और व्याकुलता होने लगती है I यदि रात में उस स्थान पर सोने की नौबत आ जाय तो अनिद्रा या नींद में व्यवधान के साथ-साथ सुबह में थकान, आलस्य और बोझिलपन जैसे अनुभव भी महसूस होते हैं I भूगर्भ से निकली विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों के प्रवाह में हुए व्यवधान के कारंण उच्च आवृति की तरंगें भूमि अथवा भवन में क्रियाशील होती हैं, उस तीव्रता के कारण उत्पन्न जिओपैथिक स्ट्रेस लाइंस की पहचान उस स्थान की दीवारों में आई दरारें और दीवारों के उखड़े प्लास्टर वाले स्थान से भी की जा सकती है I यहाँ तक कि अधिक नमी वाले स्थानों में लगने वाली काई भी जिओपैथिक स्ट्रेस जोन को दर्शाती हैं. विदेशों में इसको पहचानने के लिए डाउजिंग-पद्धति का उपयोग किया जाता है.प्राचीन रोमन सभ्यता में भी इसको पहचानने के लिए भेड़ों को काफी समय तक उस क्षेत्र में रहने के लिए छोड़ दिया जाता था और बाद में उन भेड़ों के अंगों के सूक्ष्म निरीक्षण से उस स्थान के जिओपैथिक स्ट्रेस जनित प्रभाव की जांच की जाती थी I
एक बहुत महत्वपूर्ण संकेत उस परिसर में पाए जाने वाले पशुओं और कीट पतंगों आदि से भी लगाया जा सकता है I एक ओर जहाँ गाय,घोड़े और कुत्ते जिओपैथिक स्ट्रेस जोन से दूर रहना चाहते हैं वहीँ दूसरी ओर चींटी, बिल्ली, दीमक,मधुमक्खी ,सांप, मकड़े आदि उच्च तीव्रता वाले कम्पन आवृतियों के क्षेत्र में ही पलते-बढ़ते हैं I सामान्यतः पालतू बिल्लियाँ घर के उसी स्थान पर आराम करना पसंद करती हैं जहाँ पर जिओपैथिक स्ट्रेस का प्रभाव हो, वहां की जमीनी सतह का तापमान अन्य जगहों की तुलना में ज्यादा होता है I व्यावहारिक रूप से भी किसी घर में दीमक का ट्रीटमेंट कराने के बाद स्पष्ट रूप से एक शान्ति का अनुभव होता है. ऐसा ट्रीटमेंट पृथ्वी के अन्दर से आने वाली विद्युत्-चुम्बकीय आवृति के प्रवाह को बाधित कर देता है I जिन स्थानों पर ये पशु पक्षी अथवा कीट- पतंगे पाए जाते हैं, वे स्थान जिओपैथिक तनाव से प्रभावित स्थान होते हैं और इसी कारण प्रायः सभी वास्तु-शास्त्री इन दोषों के अविलम्ब निराकरण का सुझाव देते हैं I जिस प्रकार भूगर्भ में पायी जाने वाली अंडरग्राउंड वाटर स्ट्रीम्स,खनिज भण्डार की उपस्थिति अथवा भूगर्भीय चट्टानों की परतें, पृथ्वी के केंद्र से आने वाली विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों की आवृति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं, उसी प्रकार किसी भूखंड की सीमा में पायी जाने वाली शल्यकारक वस्तुएं भी उस स्थान पर निवास करने वालों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं I प्राचीन वास्तु शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार इसका सीधा प्रभाव परिवार के सम्बंधित सदस्यों के स्वास्थ्य की हानि के रूप में दिख जाता हैं I भवन निर्माण हेतु चयन की गयी भूमि के अन्दर पाए जाने वाले शल्य का प्रभाव एक सीमित स्थान तक परन्तु काफी तीव्र होता है I टोना टोटका करने वाले या काला जादू करने वाले इसी माध्यम का दुरुपयोग करते हैं I ऐसे शल्य की उपस्थिति मात्र से ही उस भवन में निवास करने वालों को अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है I लेकिन सामान्यतः कोई व्यक्ति अपने घर का कूड़ा-कचरा या अपने घर के अवशिष्ट पदार्थों को अपने बगल की खाली जमीन पर फेंक दे या किसी खाली स्थान पर जब किसी मरे हुए जानवर के शव को डाल दिया जाय और कुछ समय के बाद जब कोई व्यक्ति उसी खाली जमीन को बिना अच्छी साफ़-सफाई के अथवा बिना शल्य निष्कासन किये बाहरी मिट्टी से अथवा किसी और मकान के मलवे से भर के उसपर भवन निर्माण कर लेता है तब जो दोष उत्पन्न होता है उससे ही शल्य दोष होता है और इसी से जिओपैथिक स्ट्रेस क्षेत्र का निर्माण होता है I इसका प्रतिकूल प्रभाव वहां रहने वाले को भोगना पड़ता है I यदि शल्य के रूप में हड्डी दबी हो तो हड्डी मिलने की दिशा के अनुसार उस भवन में रहने वालों को उसके दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं I उसी प्रकार लकड़ी, बाल, कोयला, जानवर के अंग, लोहा आदि जिस भूमि के अन्दर शल्य के रूप में हों, वहां निवास करने वालों को उसके अनुरूप दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं I इसीलिए जब भी किसी भूमि पर भवन-निर्माण किया जाय तो निश्चित रूप से किसी योग्य वास्तुविद की सलाह के अनुसार उस भूमि का शल्य उपचार करा लेना आवश्यक होता है I
जिओमैन्सी(Geopathic Stress Clearance) या शल्यदोष निवारण - प्राचीन वास्तु शास्त्र में शल्य दोषों के निवारण की अनेक विधियाँ बताई गयी हैं I विदेशों में भी जिओपैथिक स्ट्रेस क्लीयरेन्स के कई उपाय प्रचलन में हैं . प्रभावी रूप से शल्य दोष निवारण भवन निर्माण के लिए चुनी गयी भूमि की सीमा के अन्दर किसी स्थान की मिट्टी को गृहस्वामी की ऊंचाई के बराबर काट के बाहर निकाल कर और फिर उस स्थान को बाहर से लायी गयी मिट्टी से भर के किया जा सकता है I इसके अलावे भूखंड का पञ्च-गव्य उपचार भी एक बहुत ही सशक्त उपाय है I भवन निर्माण के पूर्व उस भूमि पर दुधारू गाय बछड़े सहित कम से कम तीन दिनों तक सभी व्यवस्था सहित रहने के लिए छोड़ देने से भी दोषयुक्त भूमि का शल्य दोष दूर हो जाता है I जहाँ एक ओर विदेशों में और मुख्य रूप से चाइनीज फेंग शुई में इन जिओपैथिक स्ट्रेस जनित दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए क्रिस्टल के उपयोग ,ताम्बे के रॉड , पाकुआ मिरर, पिरामिडों आदि का प्रयोग किया जाता है, वहीँ हमारे प्राचीन वास्तु-शास्त्र में इन दोषों का निराकरण मृदाशोधन के रूप में दर्शाया गया है I अन्य तरीकों में कुछ आध्यात्मिक उपाय भी हैं जैसे रेकी, प्राणिक हीलिंग और दूरस्थ मृदा शोधन ( Remote Geopathic Stress Clearance) अनेक वास्तु परीक्षण के अनुभवों के आधार पर लेखक ने स्वंय भी कई स्थानों में शल्य-दोष जनित तनाव अथवा जिओपैथिक स्ट्रेस का अनुभव किया है और उनके सम्यक निवारण के बाद हुए शारीरिक और मानसिक बदलाव को भी महसूस किया है i यदि आप में से किसी ने भी ऐसी किसी समस्या का सामना किया हो तो निश्चित रूप से एक बार शल्य-दोष निवारण अथवा जिओपैथिक स्ट्रेस क्लीयरेन्स के सम्बन्ध में किसी भी स्थानीय और सुयोग्य वास्तुविद से विमर्श कर लें और इसका स्थायी निदान करवा लें I

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Hi Ojha ji,
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