भूमि-विस्तार के वास्तु प्रभाव

यह जानकर आश्चर्य होगा कि भूमि अथवा भवन में किसी दिशा में हुए विस्तार का भी आश्चर्यजनक प्रभाव होता है I यह विस्तार भूखंड में हो अथवा भवन में, निश्चित रूप से इसका प्रभाव देखने को मिलता है I विस्तार के इस प्रभाव को समझने में वास्तु-शास्त्र के अलावे ज्योतिषीय ज्ञान भी बहुत सहायक सिद्ध होता है I तो चलें इस प्रभाव को वास्तु-शास्त्र, ज्योतिष और ऊर्जा परिभ्रमण के मिले जुले प्रभावों के रूप में समझने का प्रयास करें I

जिस प्रकार से वास्तु-शास्त्र के अनुसार घर की प्रत्येक दिशा एवं उपदिशा किसी न किसी ग्रह की प्रधानता को दर्शाती है उसी प्रकार से किसी घर का ज्योतिषीय आकलन भी उसकी दिशाओं के आधार पर किया जा सकता है I इन दोनों बातों को समझने के लिए हमें सबसे पहले वास्तु में ग्रहों के स्थान, उनके नैसर्गिक प्रभावों के साथ-साथ कुण्डली के सभी भावों का वास्तु-विश्लेषण और उनके प्रभावों को भी समझना आवश्यक हो जाता है I

वास्तुशास्त्र के मूल में पंचतत्व जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और आकाश तत्वों से प्राप्त होने वाली ऊर्जाओं और उनके प्रभावों के सूक्ष्म अध्ययन से सम्बंधित है I इसमें दिशाओं और उपदिशाओं को पांच तत्वों और उनके पारस्परिक संबंधों के आधार पर बताया गया है I ये दिशाएँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण हैं, जबकि उपदिशायें उत्तर-पूर्व (ईशान), उत्तर-पश्चिम(वायव्य), दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), दक्षिण- पूर्व   (आग्नेय) और केंद्र (ब्रह्मस्थान) हैं I इनमें जल तत्व का स्थान उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण, अग्नि तत्त्व का स्थान दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्न्येय कोण, पृथ्वी तत्व का स्थान दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण, वायु का स्थान उत्तर-पश्चिम कोण अर्थात् वायव्य कोण और आकाश-तत्व का स्थान मध्य में अर्थात् ब्रह्मस्थान में निर्धारित किया गया है I इन तत्वों के पारस्परिक सम्बन्धों से उत्पन्न प्रभावों और उनके निदान के लिए आज के आधुनिक युग में भी वास्तुशास्त्र बहुत उपयोगी है I इसी प्रकार से ज्योतिष शास्त्र में वर्णित नवग्रहों का स्थान भी वास्तुशास्त्र में सभी दिशाओं और उपदिशाओं पर निर्धारित किया गया है I ईशान कोण में देवगुरु बृहस्पति, पूर्व में सूर्य,आग्नेय में शुक्र, दक्षिण में मंगल, नैऋत्य में राहू, पश्चिम में शनि, वायव्य में चन्द्रमा,और उत्तर में बुध का स्थान नियत किया गया है I ज्योतिषशास्त्र में केतु को मोक्षकारक ग्रह मानने के कारण ईशान कोण में देवगुरु बृहस्पति के साथ इसका भी स्थान नियत किया गया है I

विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं की गति और दिशा के सम्बन्ध में भी वास्तुशास्त्र में वर्णन किया गया है, जिसमे पृथ्वी की घूर्णन गति, परिक्रमा, भू-चुम्बकीय प्रभाव आदि के आधार पर घर में इन ऊर्जाओं का प्रवाह अंग्रेजी अक्षर s के  आकार में दर्शाया गया है और इनसे मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर उनको वर्गीकृत भी किया गया है I इन ऊर्जाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऊर्जाएं पूर्व दिशा से आने वाली प्राणिक ऊर्जा है जिसका पश्चिम दिशा में क्षय हो जाता है और उत्तर दिशा से आने वाली जैविक ऊर्जा है जिसका दक्षिण दिशा में क्षय हो जाता है I ये सभी ऊर्जाएं सम्मिलित रूप से एक प्रवाह की तरह उत्तर-पूर्व से प्रवेश करती है, उसके बाद उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर जाती हुई अंत में दक्षिण-पश्चिम कोने से बाहर निकल जाती है। इसीलिए दक्षिण-पश्चिम दिशा मूल रूप से जैविक ऊर्जा और प्राणिक ऊर्जा की क्षरण दिशा अर्थात् समाप्ति की दिशा है I एक अन्य महत्वपूर्ण विन्दु यह है कि ऊर्जा का प्रवेश जमीन के  सबसे निचले स्तर से होते हुए उत्तरोत्तर उर्ध्वगति से अंग्रेजी के एस अक्षर की तरह दक्षिणी-पश्चिमी दिशा तक होता है I  इसी कारण से वास्तु-शास्त्र में उत्तर-पूर्व की दीवार की ऊंचाई को सबसे कम और दक्षिण-पश्चिम की दीवार को सबसे ऊंची रखने के सलाह दी जाती है। यह केवल घर में उन लाभकारी ऊर्जाओं को स्थिरतापूर्वक बनाए रखने के उद्देश्य के लिए किया जाता है ।

हमने प्रायः देखा है कि मजबूत आर्थिक स्थिति और भूखण्ड की सहज उपलब्धता के कारण लोग अपने भवन या भूमि के बगल की जमीन को खरीदने के लिए तत्पर रहते हैं I परन्तु घर या भूखंड में होने वाले ऐसे किसी भी विस्तार का प्रभाव निश्चित रूप से सम्बंधित दिशा और उसके प्रतिनिधि ग्रह के प्रभाव की वृद्धि के कारण अच्छा या बुरा होता है अथवा उस दिशा से सम्बंधित तत्व के प्रभाव में वृद्धि के रूप में अनुभव किया जा सकता है I इसके प्रभावों के विश्लेषण के लिए व्यक्ति की कुण्डली के विभिन्न भावों और उनके प्रभावों को भी समझना आवश्यक है I जहाँ एक ओर कुंडली का प्रथम भाव घर की पूर्व दिशा को दर्शाता है वहीँ चतुर्थ भाव घर की उत्तर दिशा को दर्शाता है, सप्तम भाव पश्चिम दिशा को और दशम भाव दक्षिण दिशा को दर्शाता है I इस चार्ट को समझने से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि घर के उत्तर-पूर्व अर्थात् ईशान कोण की दिशा कुण्डली के दूसरे और तीसरे भाव को, पंचम और छठा भाव उत्तर-पश्चिम अर्थात् वायव्य कोण की दिशा को, अष्टम और नवम भाव दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण को और एकादश और बारहवां भाव घर की दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्न्येय कोण की दिशा की स्थिति बताता है I कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों की स्थिति के आधार पर व्यक्ति के घर की विभिन्न दिशाओं और कोणों के बारे में स्पष्ट जानकारी मिल सकती है I

इस तरह हम ऊर्जा के भ्रमण मार्ग, ग्रहों के अधिक या न्यून प्रभाव और कुंडली के सभी भावों पर पड़ने वाले असर के अनुसार घर की दिशाओं और कोणों के विस्तार के प्रभावों को भी आसानी से समझ सकते हैं अर्थात् किसी दिशा अथवा कोण में हुए परिवर्तन से हम उस व्यक्ति और उसके जीवन के विभिन्न आयामों पर होने वाले असर का विश्लेषण कर सकते हैं I भूमि या भवन की किसी दिशा के विस्तार का शुभ या अशुभ प्रभाव घर में रहने वालों को ही प्राप्त होता है चाहे वह अपने भवन में रहे अथवा किराए के मकान में रहे I इसीलिए यदि किराए के मकान में भी रहना पड़े तो सोच-समझ कर ही निवासस्थान चुनना चाहिए I एक और बात जो शुरू में ही बता देना उचित होगा कि यदि किन्ही कारणों से अनजाने में नीचे बताए गए अनिष्टकारी दिशाओं अथवा कोणों में वृद्धि हो गयी हो और उसके दुष्परिणाम दिखने लगे हों तो अविलम्ब उसका वास्तु उपचार करवा लेना चाहिए जिससे और अधिक हानि या नुकसान से बचा जा सके नहीं तो यह एक स्थायी दुष्परिणाम के रूप में परिणत हो जाएगा और जीवन भर एक पीड़ादायक शूल की तरह चुभता रहेगा I अतः अब हम भूमि और भवन की प्रत्येक दिशा और कोणों के विस्तार को क्रम से समझने का प्रयास करते हैं I

पूर्व दिशा में विस्तार

पूर्व दिशा के विस्तार अर्थात् कुंडली के प्रथम भाव, दूसरे भाव और बारहवें भावों से सम्बंधित प्रतिनिधि ग्रहों सूर्य, देवगुरु बृहस्पति और शुक्र के गुणों में एक साथ वृद्धि से व्यक्ति के व्यक्तित्व, यश-प्रसिद्धि और व्यय में असाधारण विस्तार परिलक्षित होता है I कुंडली का प्रथम भाव व्यक्ति के मुखमंडल, व्यक्तित्व, शारीरिक बनावट और स्वास्थ्य की स्थिति बताता है जबकि धन भाव से व्यक्ति के संपत्ति और बारहवें भाव से उसके व्यय का पता चलता है I हालांकि बारहवां भाव व्यय भाव होने के कारण प्रायः अच्छा नहीं माना जाता परन्तु बृहस्पति के प्रभाव से ऐसा व्यय भी अच्छे प्रयोजनों से होने के कारण यश में वृद्धि ही करता है I  इसीलिए पूर्व दिशा के विस्तार से व्यक्ति के व्यक्तित्व में सूर्य के समान प्रखरता के साथ गृहोपयोगी वस्तुओं में वृद्धि होती है और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से मुक्ति मिलती है I इस तरह से हम कह सकते हैं कि पूर्व का विस्तार एक शुभ विस्तार है I अतः यदि घर की पूर्व दिशा में खाली जमीन हो तो उसे ऊंचे भाव पर भी खरीद लेना चाहिए क्योंकि ऐसी खाली जमीन भाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है I

पूर्वोत्तर (ईशान कोण) का विस्तार

ईशान कोण के विस्तार का मतलब कुंडली के दूसरे और तीसरे भाव के प्रभाव में वृद्धि, जिसका सीधा मतलब हुआ कि व्यक्ति के धन भाव और पराक्रम भाव में धनात्मक बदलाव I यदि पूर्वी ईशान में विस्तार होता है तो व्यक्ति को लक्ष्मी की प्राप्ति होगी और यदि उत्तरी ईशान में वृद्धि हो तो उसके ज्ञान और पराक्रम में वृद्धि होगी I इस कोण के स्वामी देवगुरु बृहस्पति और मोक्षकारक छायाग्रह केतु के शुभ प्रभावों से व्यक्ति में ज्ञानोदय होगा और सांसारिक लोभों से विरक्ति के साथ-साथ ईश्वर में आस्था बढ़ेगी I ऐसे व्यक्ति के घर में सदैव दैवी कृपा बनी रहती है I इसलिए उत्तर-पूर्व अर्थात् ईशान कोण में किया गया विस्तार एक अति शुभ विस्तार है जो वृद्धि व्यक्ति के लिए सर्वमंगलकारी और शुभ मानी जायेगी I अतः यदि घर की उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात् ईशान कोण में खाली जमीन हो तो उसे निश्चित रूप से ऊंचे भाव पर भी खरीद लेना चाहिए क्योंकि ऐसी खाली जमीन महाभाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है I

उत्तर का विस्तार

उत्तर दिशा व्यक्ति की कुंडली के चतुर्थ भाव का प्रतिनिधित्व करती है और बुध ग्रह का स्थान है I इस कारण से इस दिशा में हुई वृद्धि से उत्तर-पूर्व (ईशान), उत्तर और उत्तर-पश्चिम (वायव्य) दिशाओं का एक साथ विस्तार होने का प्रभाव बृहस्पति, बुध और चन्द्रमा के प्रभावों में विस्तार के रूप में अर्थात् यश, बुद्धि और आय में वृद्धि और संगत फलों की प्राप्ति के रूप में दिखता है I चतुर्थ भाव गृह्सुख, भूमि, भवन और माता के सुख से सम्बंधित प्रभावों का कारक होता है I अतः भूमि अथवा भवन के उत्तर दिशा में हुई वृद्धि से व्यक्ति की मेधा में विस्तार के साथ घर मे यश प्रतिष्ठा के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने हेतु आवश्यक साधनों में भी वृद्धि का योग बनता है अर्थात् घर में भोग-विलासिता की वस्तुओं में बढ़ोत्तरी होती है I इसीलिए घर अथवा भूमि की उत्तर दिशा में हुआ विस्तार भी शुभ विस्तार होता है और सुखकारक  होता है I अतः यदि घर की उत्तर दिशा में खाली जमीन हो तो उसे ऊंचे भाव पर भी खरीद लेना चाहिए क्योंकि ऐसी खाली जमीन भाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है I

उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) का विस्तार

उत्तर-पश्चिम अर्थात् वायव्य कोण में चन्द्रमा का स्थान होने के कारण और कुण्डली के पञ्चम और षष्ठम भाव के कारक होने के फलस्वरूप उसके अनुसार ही फलों की प्राप्ति होती है अर्थात् वायव्य का विस्तार कुंडली के पंचम भाव के फलों जैसे संतान, शिक्षा और रोमान्स के साथ-साथ छठे भाव यानी रोग, ऋण और शत्रुता में भी वृद्धि का कारक है I इसके कारण यह विस्तार शुभ और अशुभ दोनों ही प्रभावों का कारक है I चन्द्रमा मन का प्रतिनिधित्व करता है है जिसके कारण मन की चंचलता में काफी बढ़ोत्तरी होती है और आसपास के लोगों और मित्रों-शुभचिंतकों से अकारण बैर और मनमुटाव होने की संभावना बढ़ जाती है I इसीलिए इस दिशा में बहुत सोच समझ कर और पूरे उपायों के साथ भूमि अथवा भवन में विस्तार करना उचित होगा I

पश्चिम दिशा का विस्तार

इस दिशा के प्रतिनिधि ग्रह शनि के होने और कुंडली के सप्तम भाव का कारक होने के कारण इस दिशा में होने वाले विस्तार के कारण उत्तर-पश्चिम, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशाओं का एक साथ विस्तार होता है, जो छठे, सातवें और आठवें भावों से सम्बंधित प्रभावों में बढ़ोत्तरी के रूप में देखा जा सकता है I जहाँ एक ओर छठा भाव ऋण, रोग और शत्रुता का कारक है वहीँ अष्टम भाव मृत्यु, वसीयत और बीमा राशि की प्राप्ति का भी कारक है I पश्चिम दिशा प्राणिक ऊर्जा के क्षय की भी दिशा है इसीलिए जीवन में वसीयत या बीमा राशि पाने का मतलब बड़ा ही अशुभ होता है और घर के मुखिया अर्थात गृहस्वामी की मृत्यु को इंगित करता है I इन दिशाओं के प्रतिनिधि ग्रहों जैसे चन्द्रमा, शनि और राहु के सम्मिलित प्रभाव से प्रत्येक कार्यों में विलम्ब के साथ-साथ अपयश और शत्रुता अर्थात् सभी प्रकार से अमंगल और अशुभ लक्षण देखने को मिलते हैं I यहाँ तक कि पश्चिम के विस्तार का फल दीर्घकालिक पारिवारिक अधोगति के रूप में भी देखने को मिलता है जिससे उबरने में भी काफी समय लगता है I इसीलिए इस दिशा में भूमि या भवन का विस्तार अत्यंत ही अशुभ परिणाम देने वाला होता है I यदि इस दिशा में कोई खाली जमीन बिक्री के लिए उपलब्ध भी हो तो इसे आधी कीमत पर और यहाँ तक कि मुफ्त में लेना भी अहितकर है I ऐसा अशुभ विस्तार सीधे तौर पर अपने और अपने परिवार के लिए दुर्भाग्य को आमंत्रित करने जैसा है I

दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) का विस्तार

नैऋत्य कोण अर्थात् दक्षिण-पश्चिम दिशा का सम्बन्ध कुण्डली के अष्टम और नवम भावों से है, जिसका प्रतिनिधित्व राहु करता है I ऐसा विस्तार भूमि और भवन के लिए सर्वथा अनिष्टकारी है क्योंकि यह दिशा घर में राहु के प्रभाव की वृद्धि करता है I अष्टम भाव मृत्यु, वसीयत और बीमा राशि की प्राप्ति का कारक है जबकि नवम भाव भाग्य और पिता का कारक है I यह दिशा जैविक ऊर्जा और प्राणिक ऊर्जा के विलोप की भी दिशा है जिसके कारण उस घर में रहने वाले सदस्यों की समग्र ऊर्जाओं के क्षय की प्रबलता हो जाती है I इस दिशा का विस्तार उस घर में रहने वालों के मान-सम्मान, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि, आदि को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है, जिसके कारण कोर्ट-कचहरी, हॉस्पिटल, जेल आदि का भी सामना करना पड़ सकता है I इस दिशा में होने वाले विस्तार का असर उस घर में होने वाली सभी अशुभ घटनाओं में भी देखा गया है I यदि इस कोण में पश्चिम दिशा में विस्तार होता है तो ऐसा विस्तार गृहस्वामी के लिए प्राणघातक होता है और यदि ऐसा विस्तार दक्षिण दिशा की ओर होता है तो यह गृहस्वामिनी के लिए घातक होता है I इसीलिए इस दिशा में भूमि या भवन का विस्तार अत्यंत ही अशुभ परिणाम देने वाला होता है I यदि इस दिशा में कोई खाली जमीन बिक्री के लिए हो भी तो इसे किसी भी हालत में कम कीमत पर और यहाँ तक कि मुफ्त में लेना भी सब प्रकार से विनाशकारी होता है I ऐसा अशुभ विस्तार अपने और अपने परिवार के लिए सभी तरह के दुर्भाग्य को आमंत्रित करने के समान है I

दक्षिण का विस्तार

दक्षिण दिशा के विस्तार से भूमि के दक्षिण-पश्चिम, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व का एक साथ  विस्तार होता है I इस दिशा के प्रतिनिधि ग्रह राहु, मंगल और शुक्र हैं और जो व्यक्ति की कुण्डली के अष्टम, नवम और दशम भावों को दर्शाता है I दक्षिण दिशा घर की जैविक ऊर्जा के क्षय की दिशा भी है I वास्तु-शास्त्र के अनुसार यह दिशा घर की महिला सदस्यों की दिशा है और इसी कारण से इसका प्रतिकूल प्रभाव राहु, मंगल और शुक्र की युति के कारण महिलाओं के लिए अहितकर है I साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए भी इस दिशा में विस्तार अत्यंत हानिकारक पाया गया है I यदि दक्षिण दिशा में कोई खाली जमीन बिक्री के लिए हो भी तो इसे किसी भी हालत में कम कीमत पर और यहाँ तक कि मुफ्त में लेना भी सब प्रकार से हानिकारक होता है I ऐसा अशुभ विस्तार सीधे तौर पर घर की महिला सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए सभी तरह से अमंगलकारी और दुर्भाग्य को आमंत्रित करने के समान है I

दक्षिण-पूर्व (आग्न्येय कोण) का विस्तार

दक्षिण-पूर्व अर्थात् आग्न्येय कोण के विस्तार का विचार कुण्डली के ग्यारहवें, बारहवें और प्रथम भावों से किया जाता है जो मंगल, शुक्र और सूर्य के बढे प्रभावों को इन्गित करता है I मंगल और सूर्य के बढ़े प्रभाव से अंगारक योग बनता है जो व्यक्ति को उग्र बनाता है और उसमे शुक्र की प्रभावी युति से राजपक्ष से परेशानियां आती हैं, अर्थात् दक्षिण-पूर्व के विस्तार से कोर्ट-कचहरी से सम्बंधित परेशानियां बढती हैं I शुक्र और राहु की अनिष्टकर युति से घर की महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है साथ ही व्यक्ति विभिन्न व्यसनों का आदी हो जाता है I यदि दक्षिण-पूर्व दिशा में कोई खाली जमीन बिक्री के लिए हो भी तो इसे लेना हानिकारक होता है I ऐसा विस्तार सीधे तौर पर घर की महिला सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए अहितकर और परिवार के पुरुष सदस्यों के व्यसनी होने की संभावना को बढाता है साथ ही साथ राजपक्ष से चिंता-परेशानियां भी देता है I यदि कुण्डली में अन्य ग्रहों के भी अशुभ योग बन रहे हों तो व्यक्ति को कारावास का दंड भी भोगना पड़ सकता है I इसीलिए सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार की महिला सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस अमंगलकारी विस्तार से बचना चाहिए I

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