दूसरों के लिए शुभ की कामना ही हमारे अन्दर के देवत्व की अभिव्यक्ति है I परन्तु मानवोचित गुणों के कारण हमारी स्वयं के लिए भी यही स्वाभाविक इच्छा होती है और इसी की प्राप्ति के लिए हम निरंतर प्रयास भी करते रहते हैं I प्रतिदिन के कार्यों में ऐसे कई कार्य हैं जिनको करके हम अपने लिए और अपने करीबी लोगों के लिए कुछ अच्छा कर सकते हैं I अनजाने में हम कई ऎसी गलतियाँ कर देते हैं या कुछ चीजों की अनदेखी कर देते हैं जो वैसे तो काफी छोटी सी होती हैं परन्तु उनका प्रभाव काफी गंभीर होता है और न चाहते हुए और न जानते हुए भी हम जिन्हें भोगते रहते हैं I इसीलिए कुछ ऐसे ही छोटे-छोटे वास्तु-सम्मत उपायों को यहाँ बताया गया है जिनको करने से हम उन अनजाने और अनचाहे कष्टों से बच सकते हैं और घर में सुख , शान्ति और समृद्धि ला सकते हैं I
घर से बाहर निकलते समय या घर के अन्दर आने के समय हमें अपना दाहिना पैर पहले आगे बढ़ाना चाहिए क्योंकि शास्त्रों के अनुसार हमारे शरीर का दायाँ भाग शुभ कर्मों के लिए उपयुक्त माना गया है I शुरू मे कठिनाई हो सकती है परन्तु धीरे-धीरे इसकी आदत हो जायेगी I वस्तुतः हम कहीं भी अपने आभामंडल के सूक्ष्म शरीर के साथ चलते हैं जो हमारे अच्छे या बुरे भावों के अनुसार कमजोर या मजबूत होता है I क्रोध, लोभ, घृणा, ईर्ष्या आदि ऋणात्मक भावनाएं हमारे आभामंडल को कमजोर करती हैं जबकि प्रेम, क्षमाशीलता, सहिष्णुता, करुणा आदि शुभ भावनाएं हैं जो हमारे आभामंडल को मजबूती प्रदान करती हैं I एक मजबूत आभामंडल का व्यक्ति हमारे आसपास के वातावरण पर बहुत सकारात्मक असर डालता है I उसकी उपस्थिति मात्र से ही सुखद अनुभूति प्राप्त होती है जबकि कमजोर आभामंडल वाले व्यक्ति की उपस्थिति मन को खिन्न और बोझिल बना देती है I इसीलिए हमेशा प्रयास करना चाहिए कि अपने या किसी के घर से निकलने या अन्दर आने के समय शुभत्व की भावना के साथ दाहिना पैर ही आगे बढ़ाना चाहिए I
घर में प्रायः लोग स्वास्तिक, ॐ, नवग्रह पिरामिड अथवा ऐसे ही अन्य शुभ प्रतीक चिन्हों को हर जगह लगा देते हैं, यहाँ तक कि टॉयलेट और किचेन के दरवाजे पर भी लोग इसका उपयोग वास्तु सुधार के लिये करते हैं I ऐसा करना उचित नहीं है I इनका प्रयोग किसी अस्वच्छ स्थानों पर करने से इसका बुरा असर भी देखने को मिलता है I इन प्रतीक चिन्हों को अत्यधिक बायो कॉस्मिक ऊर्जा से धनी होने के कारण प्रतीकात्मक वास्तु-शास्त्र मे भी देवगुरु बृहस्पति का प्रतीक माना गया है जिनका स्थान घर के उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण में ही है I यहाँ तक कि देवी-देवताओं के चित्रों वाले वार्षिक कैलेंडर भी घर में हर जगह पर नही लगाने चाहिए क्योंकि इसका भी वैसा ही प्रभाव होता है जैसा किसी दिशा या उपदिशा के प्रतिनिधि ग्रह के साथ बृहस्पति की युति का होता है I
घर की दीवारों पर हम कलेंडर, पोस्टर या पिक्चर लगाने के लिए या विशेष अवसर पर जगह जगह कील कांटी लगा देते हैं जो बाद में भी नहीं हटाते हैं I हमारा घर ईंट, सीमेंट, छड़ों आदि से निर्मित कंक्रीट का सिर्फ ढांचा ही नहीं है बल्कि वैदिक मान्यताओं के अनुसार जीवंत ऊर्जापुन्ज है जिसे हमारे वैदिक ग्रंथों में वास्तु-पुरुष के रूप में चित्रित किया गया है I इसीलिए जिस प्रकार शरीर में कहीं कील चुभ जाने से हमें दर्द का अहसास होता है ठीक उसी प्रकार से घर की दीवारों में अनावश्यक कील-कांटी होने से वास्तु-पुरुष भी पीड़ित होते हैं परन्तु अंतर इतना ही है कि उनकी पीड़ा का असर उस घर में निवास करने वालों को ही रोग, शोक अथवा अन्य समस्यायों के रूप में भोगना पड़ता है I
कई घरों में लोग शुरूआती शौक के कारण ढेर सारे बल्ब-टयूबलाइट्स के लिए स्थान बना लेते हैं पर बाद में किन्ही कारणों से उन सभी होल्डर्स में बल्ब या टयूबलाइट्स नहीं लगाते हैं या कभी कभी तो किसी खराब बल्ब के स्थान पर घर के ही किसी अच्छे बल्ब को निकाल कर लगा देते हैं I ऐसा करके वास्तव में वो एक स्थान के वास्तु-दोष को दूर करने के क्रम में अपने ही घर के किसी और स्थान में एक नया वास्तु-दोष उत्पन्न कर देते हैं जिसका दुष्प्रभाव आखिरकार उन्हें ही भोगना पड़ता है I खाली और खुले इलेक्ट्रिक होल्डर्स से निकलने वाली सूक्ष्म विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों के कारण उसका सूक्ष्म असर एलेक्ट्रोस्मॉग के निर्माण के रूप में मिलता है जिसके कारण घर के अन्दर स्वाभाविक ऊर्जा प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न होता है I इस एलेक्ट्रोस्मॉग के कारण उस स्थान में पॉजिटिव आयन की बहुलता हो जाती है जो वहां रहने वालों के मस्तिष्क के अल्फा क्षेत्र को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है I यह अल्फा क्षेत्र व्यक्ति के उन मनोभावों का कारक है जिनसे व्यक्ति खुशी और शान्ति का अनुभव करता है, परन्तु एलेक्ट्रोस्मॉग के कारण व्यक्ति असहजता, चिडचिडापन, घबड़ाहट, नींद की कमी आदि मह्सूस करता है जो आगे चलकर उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में ह्रास का कारण बनता है I
इनके अलावे कुछ और भी छोटे-छोटे उपाय हैं जिनका ख़याल रखने से घर में सुख, शांति और उल्लास का वातावरण बना रहेगा जैसे
- भूमि और भवन के बीच में चारों ओर खुला स्थान होना चाहिए और घटते क्रम से सबसे ज्यादा खुली जगह पूर्व दिशा में, उसके बाद उत्तर दिशा में और इससे कम दक्षिण दिशा में और सबसे कम पश्चिम दिशा में खाली और खुली जगह होनी चाहिए I
- जमीन, घर और छत की ढाल दक्षिण-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व, उसके बाद उत्तर-पश्चिम और सबसे नीचे उत्तर-पूर्व की तरफ होना चाहिए I
- दर्पण और घडी को कभी भी दक्षिण या पश्चिम की दीवार पर नहीं लगाना चाहिए I
- घर की दीवारों की हमेशा देखभाल करनी चाहिए ताकि कोई दरार, पपड़ी या काई न हो पाए, ऐसा होने पर अविलम्ब इसकी मरम्मत करवानी चाहिए नहीं तो घर के सदस्यों को स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो सकती है I चौखट और दीवार के बीच की दरार की भी मरम्मत करवानी चाहिए I
- पानी के नल से लगातार रिसता पानी घर के खर्च को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देता है I
- किवाड़ों के खुलने और बंद होने के समय होने वाली होने वाली आवाजें गृहकलह और अज्ञात भय का कारण होती हैं, अतः इनके कब्जों में हमेशा तेल डालके दुरुस्त रखना चाहिए I
- शयन कक्ष में कभी भी हिंसा, क्रोध, शोक, घृणा उत्पन्न करने वाली फोटो, पेंटिंग या पोस्टर्स नहीं लगाने चाहिए नहीं तो उसी के अनुरूप परिस्थितियां बनने लगती हैं I यह स्थान नुकीली वस्तुओं जैसे तलवार, कटार, कैंची, छुरी को भी खुले में रखने के लिए नहीं है I
- घर के अन्दर की दीवारों के रंग हलके और खुशनुमा होने चाहिए, गहरे रंग की दीवारें दिशा के अनुसार घर के सम्बंधित सदस्यों की बीमारी का कारण बनती हैं I
- पूर्व दिशा की खिड़कियों में लगे शीशे ट्रांसपैरेंट अर्थात् पारदर्शी होने चाहिए नहीं तो हमेशा भ्रम और संशय की स्थिति बनी रहेगी I
- पूर्व और उत्तर दिशा में हलके रंग के हलके परदे और दक्षिण और पश्चिम दिशा में गहरे रंग के भारी परदे रहने चाहिए I
- घर के उत्तर, पूर्व और उत्तर-पूर्व दिशाओं में स्थायी रौशनी के होने से उस घर पर सदैव दैवी कृपा बनी रहती है I
- दक्षिण और पश्चिम दिशाओं में घर के बाहर की तरफ जाती रोशनी राहु, शनि और मंगल सम्बन्धी परेशानियों से मुक्ति देती हैं I
- चारदीवारी की ऊंचाई इतनी होनी चाहिए कि बाहर से गुजरने वाले घर के भीतर खिड़कियों से झाँक नहीं सकें और इसीलिए दीवारें घर की खिड़कियों को आधे से अधिक ढँक लें I
- खिड़कियों के ऊपर लगे पेलमेट की डिजाइन उत्तर और पूर्व में सपाट और दक्षिण और पश्चिम में तिकोनाकार होनी चाहिए I
- उत्तर और पूर्व दिशाओं में चारदीवारी पर लोहे की नुकीली कीलों, भालों या टूटे कांच के टुकड़ों से घेराबंदी नहीं करनी चाहिए, ऐसा उपाय सिर्फ दक्षिण और पश्चिम दिशाओं के लिए वास्तु सम्मत है I
- उत्तर और पूर्व की दीवारें दक्षिण और पश्चिम की दीवारों से नीची होनी चाहिए I
- मध्य उत्तर से मध्य पूर्व तक यदि भवन या भूमि में विस्तार है तो यह शुभ फल देने वाला है परन्तु अन्य दिशाओं में ऐसा विस्तार हो तो ताम्बे के तारों से, झाड़ियों से अथवा पिरामिड के प्रयोग से उस दोष का निवारण कर लेना ही उचित है I
- कमरे में आलमारी को दक्षिण या पश्चिम दिशा में रखना उचित है परन्तु दर्पण लगे आलमारी को इन दिशाओं में रखने से धनहानि होने की संभावना होती है I
- शयन कक्ष में हनुमान जी की फोटो नहीं रखनी चाहिए नहीं तो रात भर नींद में व्यवधान उत्पन्न होता है I पर्वत धारण किये हुए हनुमान जी की फोटो को कॉमन हाल में दक्षिण की दीवार पर लगाया जा सकता है I
- पानी, नदी, समुद्र अथवा झील की पोस्टर्स को किसी भी कमरे की उत्तर या पूर्व की दीवार पर ही लगाना चाहिए I फिश एक्वेरियम के लिए भी यही स्थान उपयुक्त है I
- दक्षिण-पूर्व के कोने में किचेन, जेनेरटर, इनवर्टर, बिजली के मीटर एवं पोल आदि होने चाहिए I इस कोने को समृद्ध बनाने के लिए एक लाल रंग का बल्ब भी लगाया जा सकता है I
- दक्षिण-पश्चिम कोण रॉक गार्डेन, सीढ़ी, लिफ्ट आदि के लिए सबसे उपयुक्त होता है जो अभूतपूर्व यश प्रदान करता है I
- पूर्व, उत्तर और उत्तर-पूर्व की दिशाओं में खाली जमीन यदि अधिक मूल्य में भी बिक रही हो तो उसे अवश्य खरीद लेना चाहिए, ऐसी जमीन भाग्यशाली को ही मिल पाती है I यदि कोई खाली जमीन दक्षिण, पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम कोने में मिल रही हो तो उसे मुफ्त में भी लेना भयंकर कष्टदायी होगा I
- पूर्वोत्तर क्षेत्र में यदि कोई पोल, खम्भा या लम्बा वृक्ष हो तो उस स्तम्भ-वेध का निराकरण उस पर एक हाई वाट का बल्ब या वेपर लाइट अपनी तरफ करके लगाने से इसका पूर्ण निराकरण हो जाता है I ऐसे वेध का एक उपाय घर की बाहरी दीवार पर एक पाकुआ दर्पण या उत्तल दर्पण लगाने से भी हो जाएगा I
- घर में दीमक,सांप, मकड़े, छिपकिली, लाल चींटियाँ, बिल्ली, चमगादड़ आदि का होना अशुभ है जबकि काली चींटी, नेवला, कुत्ता, तोता, गौरैया, बाज, मोर आदि शुभ हैं I
- घर की सीमा के भीतर तुलसी, बेल, मनी प्लांट, कमल, शमी, अनार, मेहंदी, आम, नारियल, गुलाब एवं फूलों की अन्य किस्में, हरसिंगार, ब्राह्मी, अशोक, अश्वगंधा, मुसली, गिलोई, लेमनग्रास, पान, कपूर, सर्पगंधा शतावर, रक्त चन्दन,दालचीनी आदि शुभ वनस्पतियाँ हैं जबकि कैक्टस, पपीता, रबड़, आक, नीम्बू, बेर आदि घर की सीमा के अन्दर अशुभ वनस्पतियाँ हैं I
- दैनिक क्रियाकलापों से संबंधित वास्तु-सुझाव — नीचे कुछ ऐसे कार्यों का वर्णन है जिनको हमें प्रतिदिन करना पड़ता है I इन दैनिक कार्यों को करने के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण वास्तु सुझाव दिए गए हैं I हालांकि इन सुझावों के विपरीत कार्य करने से तुरंत इनका दुष्प्रभाव नहीं दिखता है, फिर भी यदि लम्बे समय तक इनको नजरअंदाज किया जाय तो निश्चित रूप से इनके दुष्परिणाम नजर आयेंगे I मेरी व्यक्तिगत सोच यही है कि जब इन कार्यों को प्रतिदिन अनिवार्यतः हमें करना ही है तो क्यों नहीं अपने पूर्वजों के द्वारा प्राप्त अनुभवों के आधार पर प्रख्यापित नियमों पर ही अमल किया जाय और किसी संभावित परेशानी से अग्रिम बचाव कर लिया जाय I
- सोने की दिशा — उत्तर की ओर सिर करके कभी नहीं सोना चाहिए क्योंकि ध्रुवीय चुम्बकत्व के प्रभाव से गहरी नींद नहीं आएगी जिसके कारण धीरे-धीरे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ख़त्म हो जायेगी और व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाएगा I रोगी व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ के लिए पूर्व की दिशा में सिर रखके सोना चाहिए I अच्छी नींद के लिए दक्षिण दिशा में सिर रखके सोना चाहिए I हालाँकि पश्चिम दिशा की ओर भी सिर करके सोया जा सकता है I
- खाने की दिशा — अच्छे स्वास्थ्य के लिए पूर्व की दिशा में मुंह करके खाना चाहिए I धन प्राप्ति के लिए पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके खाना उचित होगा I उत्तर की ओर मुंह करके खाने से व्यक्ति पर ऋण का बोझ बढ़ता है I सामान्यतः दक्षिण की ओर मुंह करके खाने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है, परन्तु गृहस्वामी के अलावे घर के किसी अन्य सदस्य को ऐसे खाना नहीं खाना चाहिए I
- तरल पेय पीने की दिशा — कोई भी पेय पदार्थ जैसे पानी, जूस, दूध आदि पीने के लिये सर्वोत्तम दिशाएँ उत्तर, पूर्व एवम उत्तर-पूर्व हैं और वर्जित दिशाएँ दक्षिण, पश्चिम एवं दक्षिण-पश्चिम दिशाएँ हैं I स्नान करने के लिए भी इन्ही दिशाओं की ओर मुंह करना उचित होता है I
- पढने की दिशा — पढाई करने के लिये सर्वोत्तम दिशाएँ पूर्व, उत्तर और पूर्वोत्तर कोण ही हैं I उत्तर पश्चिम दिशा में मुंह करके पढाई करने से एकाग्र-चित्त होने में बाधा आएगी, दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके पढने से पढाई निष्फल जायेगी, दक्षिण या पश्चिम दिशा मे मुंह करके पढने से विलम्ब से कुछ भी समझ में आएगा और दक्षिण-पूर्व की दिशा में मुंह करके पढने से चित्त की चंचलता और उग्रता की बहुलता रहेगी I
- ध्यान साधना की दिशा — पूजा-अर्चना एवं ध्यान साधना के लिए चित्त की एकाग्रता और मन और मष्तिष्क में शीतलता अत्यंत आवश्यक होती है I घर का पूर्वोत्तर कोण जल का स्थान होने के कारण सबसे ठंढा होता है साथ ही देवगुरु बृहस्पति का कोना होने के कारण ज्ञान प्राप्ति एवं एकाग्रता से पूजा और ध्यान करने के लिए यह सर्वोत्तम दिशा है I यदि पूर्वोत्तर दिशा मे संभव नहीं हो तो पूर्व और उत्तर दिशाएँ भी इस हेतु अच्छी दिशाएँ होती हैं I
- ऑफिस में बैठने की दिशा — ऑफिस या कोई भी कार्यस्थल हमारे दैनिक क्रियाकलापों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है जहाँ हम अपने पूरे दिन का कम से कम एक तिहाई समय बिताते हैं I इस जगह पर भी यदि बैठने की वास्तु-सम्मत व्यवस्था कर ली जाय तो अपने सहकर्मियों एवं अधीनस्थों के साथ अच्छे तालमेल से हम निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के साथ-साथ पद के अनुरूप यश प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं I अतः ऑफिस में बैठने के लिए दक्षिण-पश्चिम कोने की दिशा में उत्तर, पूर्व या पूर्वोत्तर की ओर मुंह करके बैठना ही सही है जिससे सभी कार्य सुगमता से पूरे हो सकें और अपेक्षित सफलता मिल सके I ऑफिस के सामान्य कामकाज के अलावे यदि किसी महत्वपूर्ण अनुबंध () पर हस्ताक्षर करने के समय भी उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुंह रखना चाहिए अन्यथा दिशा से ही दशा बदलती है I
- शौच की दिशा — घर के शौचालय में शीट की व्यवस्था इस प्रकार से होनी चाहिए ताकि बैठते समय व्यक्ति का मुंह या तो उत्तर की ओर हो अथवा दक्षिण की ओर हो, पूर्व अथवा पश्चिम की दिशाओं की ओर मुंह करना इस कार्य हेतु वर्जित माना गया है I
- जल की व्यवस्था – घर में अथवा ऑफिस में भोजन से अधिक पानी की आवश्यकता महसूस होती है, इस हेतु वहां जल का स्थायी प्रबंध रहना चाहिए यह प्रबंध घर या ऑफिस के पूर्वोत्तर कोने में अथवा पूर्व या उत्तर दिशा में किया जा सकता है I

१a – भूखण्ड के पिछली हिस्से की चौड़ाई की भुजा ( पूरब व आंशिक रूप से पूरब आग्नेय अर्थात ese में ) २२ फुट तथा आगे हिस्से की चौड़ाई की भुजा ( उत्तर व आंशिक रूप से उत्तर वायव्य अर्थात nnw में ) 25 फुट हो इस प्रकार का भूखण्ड शुभकारी है या अशुभ कृपया इसमें निर्माण हेतु मार्गदर्शन करने की कृपा करें ।
इस भूखण्ड का मुख उत्तर-पश्चिम उत्तर nwn व पश्चिम उत्तर पश्चिम wnw की ओर है ।
१b – क्या ऐसे भूखण्ड में उत्तर वायव्य में एक बड़ा गेट देने के बाद उत्तर की ओर ईशान से पॉचवें या छठे पद में दरवाजा देना वास्तु सम्मत है ?
२ – वास्तुशास्त्र के अनुसार प्रहरी द्वार को मुख्य द्वार माना जाता है या फिर वह दरवाजा जिससे घर में प्रवेश किया जाता है। दोनों में से किसे मुख्य द्वार माना जायेगा तथा दोंनों मे से किसका प्रभाव अधिक होता है ?
३- क्या पश्चिम उत्तर पश्चिम wnw में मेन गेट बनाने के साथ साथ ईशान से पॉचवॉ या छठे पद में द्वार बनाना शुभकारी होगा।
अर्थात क्या दोनों तरफ दो दरवाजों का विधान वास्तुसम्मत है ।