
प्रायः हमने देखा है कि निर्दोष होते हुए भी किसी व्यक्ति को शासन की ओर से दण्डित किया जाता है अथवा जिस कम्पनी में वह काम करता है उस कम्पनी के डायरेक्टर का कोपभाजन बना रहता है, कभी-कभी तो किसी और की गलती के कारण सजा भी भोगनी पड़ जाती है I सरकारी कर्मचारियों को तो और भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है जब किसी फाइल में हुई किसी छोटी सी चूक के कारण बाद में किसी बड़े घोटाले का पर्दाफाश होता है और उसमें उस व्यक्ति की सीधी जिम्मेवारी तय करते हुए निलंबन, बर्खास्तगी आदि के साथ-साथ लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद उसको कारावास तक की सजा सुना दी जाती है I इससे न केवल उस व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होती है बल्कि आर्थिक हानि के साथ-साथ वह भावनात्मक रूप से भी टूट जाता है I कुछ मामलों में तो एक ही गलती के लिए जहाँ एक को बरी कर दिया जाता है वहीँ दूसरे को कठोर दण्ड दे दिया जाता है I इनकम टैक्स की छापेमारियां भी किसी के यहाँ बार –बार होती हैं और उसे अकारण विभाग का अथवा पुलिस की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है जबकि उसके ही बराबरी का दूसरा बिजनेसमैन सुरक्षित रूप से अपना कारोबार करता रहता है I ऐसे अनेक मिलते-जुलते उदाहरण हम अपने आसपास देखते हैं जिसमे किसी को राज्य सरकार की विभिन्न एजेंसियों से परेशानियों का सामना करना पड़ता है और ऐसे में हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है कि हम इन घटनाओं को या तो उस व्यक्ति की करनी का फल मान लेते हैं या नहीं तो उसके भाग्य का दोष मान लेते हैं I यह सही है कि ऐसे मामलों में ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ग्रहों के गोचरवश राशि परिवर्तन का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है, परन्तु यदि अपने घर को वास्तु-नियमों के अनुकूल कर लिया जाय तो ऐसी आकस्मिक विपत्तियों से बचा भी जा सकता है या कम भी किया जा सकता है I जहाँ एक ओर प्रतिकूल ग्रह दशा होने की स्थिति में एक वास्तु सम्मत घर छाते की तरह बचाव करता है वहीं दूसरी ओर अनुकूल ग्रह दशा होने पर भी यदि घर में वास्तु-नियमों की अनदेखी की जाय तो वही घर अपेक्षित प्रगति में बाधक भी बन जाता है I
जिस तरह ज्योतिषशास्त्र के नियमों के अनुसार किसी एक घटना के घटित होने को कई ग्रहों के सम्मिलित प्रभाव के रूप में बताया जाता है उसी तरह से वास्तु-शास्त्र के अनुसार भी किसी एक घटना के लिये पूर्ण रूप से किसी एक ही दिशा या उप दिशा के दोष का प्रभाव नहीं होता बल्कि सभी दिशाओं में हुए अनेक दोषों का सम्मिलित असर होता है I उदाहरण के रूप में जिस प्रकार नदी का तटबंध उसी जगह से टूटता है जो जगह सबसे कमजोर होती है, उसी प्रकार अनेक वास्तु-दोषों के रहने पर भी कोई एक वास्तु-दोष ऐसा होता है जो किसी विशेष प्रभाव का मुख्य कारक हो जाता है I अनुभवों से ऐसा पाया गया है कि इन सभी समस्याओं के मूल में दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय कोण का बहुत व्यापक प्रभाव रहा है I इसीलिए अन्य दिशाओं और उप दिशाओं के दोषों के रहते हुए यदि दक्षिण-पूर्व की दिशा में दोषों का कुछ विशेष योग हो जाय तो ऊपर लिखी हुई बहुत सारी समस्याएं व्यक्ति के जीवन में घटित होने लगती हैं I दक्षिण-पूर्व दिशा का प्रभाव इन समस्याओं के मूल में होने के क्या कारण हैं इनको समझना बहुत आवश्यक है और इसके लिए सामान्य रूप से ग्रहों की प्रकृति, वास्तु नियमों के अनुसार ग्रहों के स्थान, प्रतीकात्मक वास्तुशास्त्र के अनुसार उस दिशा में होने वाले कुछ महत्वपूर्ण योगों तथा तात्विक वास्तु-शास्त्र के अनुसार उस स्थान के अधिपति अग्नि तत्व के प्रभावों को विश्लेषण का आधार बनाया जा सकता है I
जिस प्रकार ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सारे ग्रह किसी न किसी प्रभाव के नैसर्गिक या तात्कालिक कारक होते हैं I उसी प्रकार वास्तु शास्त्र के अनुसार भी घर की प्रत्येक दिशा अथवा कोण व्यक्ति के जीवन के किसी न किसी क्षेत्र को प्रभावित करते हैं I वैदिक ज्योतिष के अनुसार लग्न कुण्डली का बारहवां भाव अन्य प्रभावों के अतिरिक्त कारावास का भी सूचक होता है, उसी प्रकार से वास्तु शास्त्र के अनुसार व्यक्ति के घर का आग्न्येय कोण ( दक्षिण-पूर्व ) भी राजप्रियता, राजभय एवं राजदण्ड का कारक होता है I इस दिशा का स्वामी शुक्र दाम्पत्य सुख का नैसर्गिक कारक होने के साथ व्यक्ति के लग्न कुंडली के जिन भावों का भावाधिपति होता है, उन भावों का तात्कालिक कारक भी होता है I इसके अतिरिक्त शुक्र का एक और महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि आग्न्येय कोण के अधिपति होने के कारण शुक्र राजप्रियता का भी कारक बन जाता है I वैसे तो राजप्रियता से मतलब राजा का प्रिय होना होता है परन्तु आज के सन्दर्भ में व्यक्ति का अपने उच्चाधिकारियों से अच्छा सम्बन्ध होना भी राजप्रियता ही कहलाता है I
अतः यदि दक्षिण-पूर्व कोने को वास्तु नियमों के अनुरूप रखा जाय तो निर्दोष होने की स्थिति में इससे सरकार अथवा उच्चाधिकारियों से सम्बंधित परेशानियों से काफी हद तक मुक्ति मिल सकती है I परन्तु जैसा कि पूर्व में भी बताया गया है कि कोई एक प्रभाव अनेक ग्रहों के प्रतिकूल होने की स्थिति में ही फलित होता है भले ही मुख्य अथवा तात्कालिक कारक कोई एक ही ग्रह हो I जैसे ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) के दूषित होने की स्थिति में देवगुरु बृहस्पति के नैसर्गिक कारकत्व के बाधित होने से अन्य प्रभावों के अतिरिक्त यह यश-प्रतिष्ठा में बाधा उत्पन्न करता है, वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) का कोना जो मित्र और शुभचिंतकों का कारक है, दूषित होने की स्थिति में शत्रुता को बढाता है और शुभचिंतक भी शत्रुवत व्यवहार करने लगते हैं, नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) के वास्तु दोष के फलस्वरूप दिशा स्वामी राहु जो अभूतपूर्व सफलता और उन्नति का कारक है, उतना ही विपरीत फल देता है I इसीलिए हम कह सकते हैं कि राजप्रियता में कमी मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व कोण के दोषों के कारण तो होती ही है साथ ही अन्य दिशाओं और कोनों का भी इसमें उतना ही महत्व रहता है I राज्य अथवा उच्चाधिकारियों से होने वाली परेशानियां दक्षिण-पूर्व कोण के दोषों के अलावे उस व्यक्ति के घर में होने वाली अन्य वास्तु विसंगतियों के सम्मिलित प्रभावों के कारण होती हैं I ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी की लग्न कुंडली में शुक्र उच्च का हो अथवा अच्छे भावों का स्वामी हो तो गोचर के प्रभाव से और विन्शोत्तरी दशा के कारण उस व्यक्ति को राजप्रियता का फल प्राप्त होता है I उसी प्रकार वास्तु-शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के घर अथवा फैक्ट्री के दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय कोण में वास्तु-सम्मत निर्माण जैसे किचेन, जेनेरटर, बिजली का पोल, ट्रान्सफार्मर, बिजली का मीटर, ब्यॉयलर, फरनेस आदि हो तो उसका शुक्र अच्छा माना जाएगा और व्यक्ति को राजप्रियता का फल प्राप्त होता है I ऐसे शुभ फल की प्राप्ति के लिए घर की छत पर लगा सोलर प्लांट भी इसी दिशा में होना आवश्यक है I
दक्षिण-पूर्व में शुक्र के प्रतिनिधि वृक्ष जैसे अनार, आंवला, मनीप्लांट का होना भी व्यक्ति के शुक्र को बलवान बनाता है परन्तु इसमें कोण-सूत्र का ख़याल रखना आवश्यक है अन्यथा इसका दुष्प्रभाव भी हो सकता है I
परन्तु इस दिशा में जलश्रोत का होना, गड्ढे होना, सीढ़ियों का होना एवं इस कोने का बढ़ा होना निश्चित रूप से इस दिशा को वास्तु दोषों से युक्त बनाता है और ऐसा होने पर अन्य प्रभावों के अतिरिक्त व्यक्ति को राज दण्ड अर्थात कानूनी पचड़ों में फंसना पड़ता है I दक्षिण-पूर्व के पूर्वी दिशा से यदि कोई रास्ता घर तक उसी स्थान पर समाप्त हो जाता है तो ऐसे मार्ग प्रहार के कारण व्यक्ति के कारावास की भी संभावना बढ़ जाती है, उसी प्रकार वायव्य (उत्तर-पश्चिम) कोण की उत्तरी दीवार पर यदि कोई रास्ता आकर समाप्त हो जाय तो व्यक्ति को बंधन भय अर्थात कारावास का भय सताता है और यदि इस स्थान को काले रंग से रंग दिया जाय तो राहु का रंग होने के प्रभाव से ग्रहण योग बनता है और शत्रुओं में काफी वृद्धि हो जाती है जो भविष्य में दण्ड या कारावास का द्वार खोलते हैं I भूमि के आग्न्येय कोण के बढे होने के कारण भूमि में अग्नि तत्व की वृद्धि हो जाती है जिससे व्यक्ति में उग्रता बढ़ जाती है और इसके परिणामस्वरूप लड़ाई झगड़े की प्रवृत्ति बढती है I परिणाम यह होता है कि लड़ाई झगडा होने की स्थिति में पुलिस एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण कानूनी उलझनों का भी सामना करना पड़ता है I इसका असर तब और भी गंभीर हो जाता है यदि नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में भी वृद्धि हो और राहु के बढे प्रभाव के कारण व्यक्ति में हिंसक प्रवृत्ति भी बढ़ जाती है और तब इसका भयंकर दुष्परिणाम भोगना पड़ सकता है I यदि घर के आग्न्येय कोण में सीढ़ीघर के ऊपर पानी की टंकी रखी गयी हो तो शुक्र, राहु और चन्द्रमा की अनिष्टकारी युति के कारण भी दंड अथवा कारावास का योग बन सकता है I इसके अलावे ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में यदि पांच महादोषों में से कोई दो महादोष भी मिल जाएँ तो भी दण्ड या कारावास की संभावना बन जाती है I यहाँ तक कि ईशान कोण में सेप्टिक टैंक का होना भी अन्य दुष्प्रभावों के अतिरिक्त कारावास की संभावना बनाता है I
इसीलिए यदि किसी को राज्य पक्ष से अथवा उच्चाधिकारियों से शुरूआती परेशानियां महसूस हो रही हों तो निश्चित रूप से वास्तु-सम्मत संरचनात्मक सुधारों के द्वारा अथवा पिरामिड के उचित प्रयोगों से अथवा ताम्बे के तारों की घेराबंदी से या ऐसी ही किन्ही अन्य शास्त्रोक्त विधियों से अपने घर का वास्तु उपचार करवा लें अन्यथा बाद में यही विकराल रूप धारण कर सकता है I
