
पूजा घर के रख-रखाव के मामले में बहुत सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि इसी स्थान से व्यक्ति को जीवन में दैवी कृपा से सभी प्रकार की खुशियाँ, सफलता, धन-धान्य की प्राप्ति होती है I इसमें हुई कोई त्रुटि जीवन को उतना ही दुखमय, निराशाजनक एवं क्लेशपूर्ण बना सकती है I
- पूजा स्थान को उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में रखना चाहिए I
- पूजा घर को हमेशा प्रकाशित रखना चाहिए, यदि प्राकृतिक प्रकाश की कमी हो तो बिजली के बल्ब से भी इसे हमेशा अँधेरे से मुक्त रखना चाहिए I सफ़ेद या पीले रंग के बल्ब इस स्थान के लिए उपयुक्त हैं I
- पूजा घर की प्रतिदिन सफाई होनी चाहिए और इसे मकडी के जाले, धूल, गर्द, धब्बे, पपड़ियों, काई आदि से हमेशा मुक्त रखना चाहिए I ये सभी चीजें पूजा स्थान में राहु के प्रभाव को दर्शाती हैं जिनके कारण गुरु-चांडाल योग जैसा अशुभ योग बनता है I
- देवी-देवताओं की फोटो के साथ पूर्वजों की फोटो को पूजा के स्थान पर रख कर एक साथ पूजा नहीं करनी चाहिए I पूर्वजों की फोटो का स्थान दक्षिण-पश्चिम की दक्षिणी दीवार होती है और दोनों को एक स्थान पर रख कर पूजा करने से देव-दोष और पितृ-दोष लगता है I अकारण सभी कार्यों में बाधा और फल प्राप्ति में विलम्ब का सामना करना पड़ सकता है I
- रसोई घर में पूजास्थान रखना भी देवगुरु बृहस्पति और असुरगुरु शुक्राचार्य को एक साथ रखने जैसा है जिसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं I बृहस्पति संतानकारक ग्रह है और उसका रसोई घर में अर्थात् अग्नि के समीप होने से संतान-प्राप्ति में बाधा हो सकती है साथ ही अनावश्यक खर्च का भी योग होता है I
- मूर्ति की पूजा का अलग विधान होता है जिसमे प्रतिदिन आरती, भोग और विसर्जन की विधियाँ शामिल होती हैं I ऐसा नहीं करने पर भी देव-दोष लगता है जिसके कारण कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है I चूंकि घर में पवित्रता के साथ इन सभी विधानों का पालन गृहस्थ धर्म के निर्वहन के साथ करना कठिन होता है अतः यथा संभव घर के पूजा स्थान में मूर्ति की पूजा से बचना चाहिए I डेकोरेशन के तौर पर मूर्तियों को वास्तु के नियमों के अनुकूल उचित स्थान पर रखा जा सकता है I
- घर में पूजा स्थान को किसी हल्के रंग जैसे हल्के पीले, सफ़ेद, हल्के हरे, सुनहरे आदि रंगों से ही रंगना चाहिए I कभी भी काले, नीले, भूरे अथवा चितकबरे रंगों से नहीं रंगना चाहिए I बृहस्पति का रंग पीला होता है और इस स्थान को बृहस्पति के मित्र रंगों से ही रंगना शुभ फलदायी होता है I
- पूजा के क्रम में सुबह को अर्पित किया हुआ फूल शाम को उतार के पूजा के स्थान को साफ़ कर देना चाहिए ताकि भगवान् बासी फूलों के साथ शयन नहीं करें I
- पूजा के लिए देवी देवताओं की फोटो या पोस्टर फटे हुए या रूग्ण नहीं होने चाहिए नहीं तो लाभ के स्थान पर हानि होने की संभावना होती है I
- पूजा स्थान को क्रिस्टल से निर्मित वस्तुओं से ऊर्जान्वित रखना चाहिए और उन क्रिस्टल की वस्तुओं की नमक पानी के घोल से नियमित रूप से सफाई होनी चाहिए ताकि उसमे जमी नेगेटिव इनर्जी को हटाके पॉजिटिव इनर्जी को बढाया जा सके I
- पूजा घर में प्रयोग में लाये जाने वस्त्रों का रंग भी सफ़ेद अथवा पीला होना चाहिए और उसको भी नियमित अंतराल पर साफ करते रहना चाहिए I
- पूजा स्थान में पारद शिवलिंग, दक्षिणावर्त शंख, एकाक्षी नारियल, स्फटिक श्रीयन्त्र, ईशान पात्र आदि शुभ वस्तुओं के होने और उनकी प्रतिदिन पूजा करने से पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है I
- पूजा के स्थान में पूजा सामग्रियों को धोने के लिए उत्तर-पूर्व के कोने में पानी का नल होना चाहिए I
- पूजा करते समय पूजा करने वाले का मुख पूर्व, उत्तर या उत्तर-पूर्व की दिशा में होना चाहिए I
- पूजा में प्रयोग होने वाली सामग्रियों जैसे अगरबत्ती, माचिस, भोग-आरती की वस्तुओं आदि को पूजा के लिए बने लकड़ी के मंदिर के ऊपर अथवा देवी देवताओं के फोटो के ऊपर नहीं रखना चाहिए I प्रायः लोग ऊपर के स्थान को धार्मिक पुस्तकों से अथवा पूजा के लिए प्रयोग होने वाली सामग्रियों से भारी कर देते हैं जो वास्तव में देवी-देवता के सिर पर ही अनावश्यक बोझ का काम करता है I धार्मिक पुस्तकों को पूजा के स्थान के ही बगल में अलग से आसन पर रखना चाहिए I
- पूजा के लिए जो भी सामग्री रखनी हो तो उसे पूजा स्थान के दक्षिण-पश्चिम कोने में रैक बनाकर रखा जा सकता है I सफाई के सामानों को भी रैक की ही दिशा में रखा जाना चहिये I
- हवन करने के लिए हवन-कुण्ड को दक्षिण-पूर्व कोण में रखना चाहिए और हवन करते समय हवनकर्ता का मुख पूर्व और पुरोहित का मुख उत्तर की दिशा में होना चाहिए I
पूजा के स्थान में रखे गए देवी-देवताओं की फोटो को जमीन की सतह से कुछ ऊपर शुभ लकड़ी से बनी पीठ पर अथवा इस हेतु बनाए गए मंदिर में ही स्थान देना चाहिए और उनको भी उपयुक्त दिशा में ही रखा जाना चाहिए ताकि उनके श्रीमुख के दर्शन यथाविधि किये जा सकें जैसे; भगवान् श्रीराम के दरबार की फोटो को पूर्व की दीवार के सहारे, महादेव शिव के परिवार को उत्तर की दीवार पर, प्रथम पूज्य श्री गणेश और कार्तिकेय देवता को दक्षिण की दीवार से लगा के और रुद्रावतार हनुमान जी की फोटो को उत्तर-पूर्व कोने में इस प्रकार से रखना चाहिए ताकि उनकी दृष्टि दक्षिण–पश्चिम की दिशा में अर्थात राहु की दिशा में बनी रहे जिससे कि राहु नियंत्रण में रहे I श्री गणेश देव तथा कार्तिकेय देव की फोटो को उत्तर की दीवार पर भी रखा जा सकता है I लक्ष्मी-गणेश की फोटो को अथवा उनकी ९ अंगुल से छोटी प्रतिमा को उत्तर की दीवार से लगा के उनकी पूजा की जा सकती है I शक्ति की देवी मां दुर्गा एवं मां काली की फोटो को उत्तर या दक्षिण की दीवार पर रखा जा सकता है I शिक्षा और ज्ञान की देवी मां सरस्वती की फोटो को पूर्व की दीवार पर रखना चाहिए, पूर्व दिशा सूर्य की अर्थात् प्रकाश की दिशा है I ज्ञान ही प्रकाश है इसीलिए ज्ञान की देवी मां सरस्वती का स्थान पूर्व की दिशा में रखा गया है I विष्णु के सभी अवतारों की फोटो को जहाँ पूर्व की दिशा में स्थान देना चाहिए वहीँ रूद्र के अवतारों को उत्तर का स्थान देना चाहिए I कुछ लोग सर्व धर्म समभाव की भावना से पूजा घर में ही ईसा मसीह की भी फोटो अथवा उनकी सलीब पर लटकी मूर्ति को स्थान देते हैं जो देव पूजा के साथ मानव देवता की पूजा के समान होता है I ऐसा करना शास्त्र-सम्मत नहीं माना जा सकता है क्योंकि जिस भी पूजा विधान को माना जाय उसका पूरी शुद्धता से पालन होना चाहिए I प्रायः हम पूजा के स्थान में देवी देवताओं के रौद्र रूप की भी पूजा करते हैं जैसे धराशायी महादेव पर मां काली के चरणों वाली प्रचलित और सर्वसुलभ फोटो अथवा नृसिंह अवतार में हिरण्यकश्यप वध की फोटो, परन्तु जहाँ एक ओर ये फोटो शांत मन को विचलित करते हैं वहीँ दूसरी ओर इनकी पूजा से किसी दैवी आशीर्वाद की उम्मीद नहीं की जा सकती I अतः पूजा कक्ष में देवी देवताओं के सौम्य और आशीर्वादी रूपों को ही पूजा के लिए रखना चाहिए I
